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संपादकीय: वेनेजुएला का संकट

वेनेजुएला लंबे समय से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। पिछले कुछ सालों में वहां मुद्रास्फीति तिरासी हजार फीसद तक बढ़ गई है। लोगों के पास खाने तक को नहीं है। लाखों लोग पड़ोसी देशों में शरण ले चुके हैं। देश के भीतर विपक्ष की अगुआई में विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला थम नहीं रहा।

Author January 26, 2019 2:42 AM
देश के भीतर विपक्ष की अगुआई में विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला थम नहीं रहा। ऐसे हालात देश को अस्थिरता की ओर धकेल रहे हैं। (तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर। FILE PHOTO: REUTERS)

अकूत तेल संपदा वाला देश वेनेजुएला इन दिनों गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है। एक ओर निर्वाचित राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की वैध सत्ता है, तो दूसरी ओर विपक्षी नेता जुआन गुएडो ने अपने को राष्ट्रपति घोषित कर दिया है और समानांतर सत्ता का केंद्र बन गए हैं। वेनेजुएला के इस संकट की धुरी अमेरिका बना हुआ है। अमेरिका और उसके कुछ पिछलग्गू दक्षिण अमेरिकी राष्ट्रों ने गुएडो को अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में मान्यता दे दी है और देश में नए चुनाव कराने की बात कही है। जाहिर है, अमेरिका का एकमात्र मकसद वेनेजुएला में तख्तापलट कर अपने अनुकूल सरकार बनवाना है। इसलिए वेनेजुएला का यह संकट अब देश के दायरे में सीमित नहीं रह गया है, इसने दुनिया के तमाम देशों के दो खेमों में बांट दिया है- वेनेजुएला के समर्थक और विरोधी। अमेरिका के मैदान में उतरने के बाद रूस, चीन, तुर्की, मैक्सिको, क्यूबा सहित कुछ दक्षिणी अमेरिकी देश भी खुल कर मादुरो के समर्थन आ गए हैं। जबकि कनाडा, ब्रिटेन, अर्जेंटीना, ब्राजील और यूरोपीय संघ जैसे देश अमेरिका की हां में हां मिला रहे हैं। कुल मिला कर वेनेजुएला दुनिया का नया अखाड़ा बनने की ओर अग्रसर है।

तेल संपन्न राष्ट्रों पर कब्जा करने की अमेरिका की रणनीति पुरानी रही है। पहले किसी न किसी मुद्दे पर अमेरिका तेल से भरपूर राष्ट्रों के साथ विवाद पैदा करता या कराता है और फिर इसकी आड़ में वहां सत्ता परिवर्तन करवाता है। ईरान, इराक जैसे देश इसका बड़ा उदाहरण हैं। तेल के लिए ही अरब बिरादरी में अमेरिका की गहरी पैठ है और अरब देश उसके इशारे पर चलते हैं। लेकिन वेनेजुएला पर कब्जा उसके लिए अभी तक सपना ही रहा है। हाल में जिस तरह का विवाद खड़ा किया गया है उसके मूल में भी तेल की राजनीति ही है। अमेरिका शुरू से मादुरो की सत्ता के खिलाफ रहा है और उन्हें सत्ता से बाहर करना चाहता है। मादुरो ने अमेरिका पर तख्तापलट का आरोप लगाते हुए उसके साथ राजनयिक रिश्ते तोड़ लिए हैं और उसके राजनयिकों को देश छोड़ने को कह दिया है। दूसरी ओर अमेरिका ने गुएडो को राष्ट्रपति की मान्यता देते हुए अपने राजनयिकों को अमेरिका नहीं छोड़ने को कहा है। ऐसे में सवाल है कि देश में कौन किसकी सत्ता को मानेगा? हालांकि अभी तक सेना और देश की न्यायपालिका मादुरो के साथ ही है। पर जनता में व्याप्त रोष और विद्रोह से निपटना मादुरो के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

वेनेजुएला लंबे समय से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। पिछले कुछ सालों में वहां मुद्रास्फीति तिरासी हजार फीसद तक बढ़ गई है। लोगों के पास खाने तक को नहीं है। लाखों लोग पड़ोसी देशों में शरण ले चुके हैं। देश के भीतर विपक्ष की अगुआई में विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला थम नहीं रहा। ऐसे हालात देश को अस्थिरता की ओर धकेल रहे हैं। भारत और अमेरिका वेनेजुएला के दो बड़े तेल खरीददार हैं। अब अमेरिका का अगला कदम वेनेजुएला से तेल खरीद पर पाबंदी लगाना होगा, जो उसकी अर्थव्यवस्था को धक्का पहुंचाने वाला होगा। भारत की भी कई तेल कंपनियां वेनेजुएला के तेल उद्योग से जुड़ी हैं। इसके अलावा वेनेजुएला भारत के लिए बड़ा दवा बाजार है। ऐसे में भारत वेनेजुएला की घटनाओं से अछूता नहीं रह सकता। सवाल वेनेजुएला की संप्रभुता का है। देश के अंदरूनी संकट में दूसरे देशों का कूदना उसे और गर्त में धकेलने वाला होगा।

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