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संपादकीय: रोजगार और हकीकत

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि रोजगार क्षेत्र के हालात विकट हैं। यह समस्या विकराल रूप इसलिए धारण कर चुकी है कि शिक्षित युवाओं की फौज तो बढ़ रही है, सरकारें उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहीं। निजी क्षेत्र में स्थिति और गंभीर है, जहां सिर पर हमेशा छंटनी की तलवार लटकी रहती है।

Author February 12, 2019 5:31 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव))

नौकरी नहीं मिलने की वजह से अगर नौजवानों को खुदकुशी जैसे कदम उठाने को मजबूर होना पड़े तो यह सरकार और समाज दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। कोई हफ्ता ऐसा नहीं गुजरता जब काम नहीं मिलने या नौकरी चली जाने की वजह से नौजवानों के जान देने की खबर देखने-सुनने में न आती हो। चिंताजनक बात यह है कि आज बड़ी संख्या में ऐसे नौजवान हैं जो इंजीनियरिंग या अन्य पेशेवर कोर्स कर चुके हैंलेकिन उनके पास काम-धंधा नहीं है। दिल्ली में चार दिन पहले फिर एक बीटैक डिग्रीधारी इंजीनियर ने पुल से छलांग लगा कर इसलिए जान दे दी कि उसे नौकरी नहीं मिल रही थी। कुछ महीने पहले राजस्थान के अलवर जिले में चार नौजवानों ने ट्रेन के सामने कूद कर सामूहिक रूप से खुदकुशी कर ली थी। भले सरकारों तक इन नौजवानों की आवाज न पहुंची हो, लेकिन इस घटना ने बेरोजगारों की पीड़ा को सामने ला दिया था। इस तरह की घटनाएं बता रही हैं कि हमारी सरकारें रोजगार मुहैया कराने के मोर्चे पर एकदम नाकाम साबित हुई हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार ऐसे विषय हैं जिनसे केंद्र और राज्य की सरकारें मुंह नहीं मोड़ सकतीं। शिक्षित नौजवानों को रोजगार मुहैया कराना सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन हालात और आंकड़े बताते हैं कि इन तीनों मोर्चों पर भारत का सरकारी तंत्र विफल साबित हुआ है। जब चुनाव करीब आते हैं तो हर दल और सरकार के लिए रोजगार एक बड़ा मुद्दा इसलिए बन जाता है कि नौजवान मतदाता बड़े वोट बैंक होते हैं। इसलिए तब हर दल और सरकारें बड़े-बड़े दावे करते हैं, बेरोजगारी भत्ते जैसे प्रलोभन देते हैं, लेकिन चुनाव बाद ये वादे हकीकत में तब्दील होते नजर नहीं आते। ऐसे में इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन जैसे पेशेवर कोर्स करने वालों को काम नहीं मिलेगा तो हताश होना स्वाभाविक ही है। लाखों रुपए खर्च करके पढ़ाई करने के बाद काम नहीं मिलना निश्चित रूप से युवाओं में हताशा पैदा करने वाली बात है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि रोजगार क्षेत्र के हालात विकट हैं। यह समस्या विकराल रूप इसलिए धारण कर चुकी है कि शिक्षित युवाओं की फौज तो बढ़ रही है, सरकारें उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहीं। निजी क्षेत्र में स्थिति और गंभीर है, जहां सिर पर हमेशा छंटनी की तलवार लटकी रहती है। सरकार के रोजगार संबंधी आंकड़े तो भ्रम की स्थिति पैदा करने वाले हैं। बेरोजगारी और इसके आंकड़ों को लेकर देशभर में जो बहस चलती रही है वह सरकार के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ सालों में केंद्र और राज्य सरकार ने अपने यहां लाखों नौकरियां खत्म कर दी हैं। रोजगार के नाम पर कम पैसे में ठेके पर काम पर रखने की नीति चल पड़ी है। हाल में फिर लाखों नौकरियों के सृजन का दावा किया गया है। सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने पिछले साल जो रिपोर्ट जारी की थी वह हकीकत सामने लाने वाली थी। इसमें कहा गया था कि पैंतालीस साल में पहली बार बेरोजगारी दर छह फीसद से ऊपर निकल गई है। इससे सरकार के हाथ-पैर फूल गए थे और सरकार ने इसे अधूरा करार दिया था। इससे साफ है कि रोजगार को लेकर सरकारी दावे जहां खोखले साबित हो रहे हैं वहीं आंकड़े भ्रम पैदा कर रहे हैं। सवाल है कि अगर लाखों नौकरियां सृजित हो रही हैं, काम के मौके बन रहे हैं तो फिर नौजवानों को काम मिल क्यों नहीं रहा?

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