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जनसत्ता संपादकीय : नए निजाम का अर्थ

अनेक सरकारी बैंकों का पैसा कर्ज में फंसा हुआ है, जिससे उनके कारोबार की रफ्तार मंद पड़ गई है। बैंकों के पास पूंजी बढ़ेगी तभी वे अधिक से अधिक कर्ज देने और कमाई कर सकने की स्थिति में होंगे।

Author नई दिल्ली | August 22, 2016 5:35 AM
उर्जित पटेल (दाएं) के साथ आरबीआई के वर्तमान गवर्नर रघुराम राजन।(REUTERS/Danish Siddiqui/File Photo)

आखिरकार रिजर्व बैंक के नए गवर्नर को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर विराम लग गया है। रघुराम राजन की विदाई की घोषणा के साथ ही नए गवर्नर को लेकर कयास लगाए जाने लगे थे। इसके लिए चार-पांच नामों पर विचार किया गया, मगर उर्जित पटेल को लेकर सहमति बनी। उर्जित इस पद के लिए इसलिए उपयुक्त समझे गए, क्योंकि आर्थिक सुधारों के मामले में उनके विचार काफी हद तक सरकार के अनुरूप हैं। पिछले तीन सालों से वे रिजर्व बैंक के साथ जुड़े हैं और विकास को अहमियत देते रहे हैं। केंद्रीय कर के हिमायती रहे हैं और मुद्रास्फीति पर नकेल कसने को लेकर सख्त हैं।

अनेक मामलों में उनके विचार रघुराम राजन से मिलते-जुलते हैं। मगर रघुराम राजन और सरकार के बीच मतभेद तब उभरे जब उन्होंने प्रधानमंत्री की कुछ घोषणाओं को अव्यावहारिक करार दिया। उर्जित काम में यकीन करते हैं, राजन की तरह मुखर नहीं हैं। उर्जित को तीन साल का कार्यकाल मिला है और इसमें उन्हें कई चुनौतियों को पार करना है। देखना है, इस मामले में वे कितने खरे उतर पाते हैं। सरकार ने आर्थिक विकास दर का लक्ष्य आठ फीसद रखा है। मगर इस बीच महंगाई पर अंकुश लगाना मुश्किल बना हुआ है। मुद्रास्फीति की दर पर काबू पाने और बैंकों के कारोबार में तेजी लाने की चुनौती है। हालांकि उर्जित ने संकेत दिया है कि वे बैंक दरों को लेकर उदारता बरतने के पक्षधर नहीं हैं। ऐसे में इन चुनौतियों से पार पाना फिलहाल आसान नहीं कहा जा सकता।

विकास दर में बढ़ोतरी के लिए सरकार की बैंक नीति को व्यावहारिक बनाना जरूरी होता है। मगर फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था के सामने जिस तरह की चुनौतियां हैं, उसमें संतुलन बनाना खासी कुशलता की अपेक्षा रखता है। बैंक दरों के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए जहां एक तरफ महंगाई पर काबू पाने की कोशिश की जा रही है, वहीं इसके चलते दूसरी तरफ कई क्षेत्रों के उत्पादन पर प्रतिकूल असर दिख रहा है। बाजार में पैसे का प्रवाह धीमा होता है, तो वस्तुओं के निर्माण की गति भी थम जाती है। अगर बाजार में पूंजी का प्रवाह बढ़ता है, तो महंगाई बढ़ने का खतरा बना रहता है। फिलहाल सरकार के सामने महंगाई रोकने के साथ-साथ घरेलू बचत बढ़ाना आवश्यक है। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि उर्जित नए बैंकों को लाइसेंस देकर बैंकों के कारोबार में गति लाने का प्रयास करेंगे। सरकार वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम को लागू करने की जल्दी में है। इससे शुरुआती दौर में अर्थव्यवस्था की गति प्रभावित होने की आशंका है।

उर्जित को इससे पार पाना होगा। उनके लिए सबसे कठिन काम सरकारी बैंकों का खाता साफ-सुथरा बनाना है। अनेक सरकारी बैंकों का पैसा कर्ज में फंसा हुआ है, जिससे उनके कारोबार की रफ्तार मंद पड़ गई है। बैंकों के पास पूंजी बढ़ेगी तभी वे अधिक से अधिक कर्ज देने और कमाई कर सकने की स्थिति में होंगे। विकास संबंधी अनेक योजनाएं भी इसी से गति पा सकेंगी। उर्जित इसे कैसे पूरा कर पाएंगे, वक्त बताएगा। उद्योगों का दबाव है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरें कम करे, मगर ऐसा करने से महंगाई पर काबू पाना कठिन होगा। इन सबके बावजूद उर्जित के गवर्नर बनने पर उद्योग जगत ने प्रसन्नता जताई है। डिप्टी गवर्नर रहते उनकी कार्यप्रणाली को देखते हुए उनके इन तमाम चुनौतियों से पार पाने की उम्मीद स्वाभाविक है।

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