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जनसत्ता संपादकीय : नक्सली नासूर

नक्सल समस्या पर काबू न पाए जा सकने का बड़ा कारण सरकार का उनके साथ बातचीत का व्यावहारिक सिलसिला शुरू न कर पाना और उन्हें विश्वास में न ले पाना भी है।

Author नई दिल्ली | July 21, 2016 6:33 AM
नक्सली (फाइल फोटो)

नक्सली हमलों पर काबू पाने के मकसद से विभिन्न राज्यों में अब तक अनेक उपाय आजमाए जा चुके हैं, मगर इस समस्या का हल निकाल पाना चुनौती बना हुआ है। बिहार के औरंगाबाद जिले में नक्सली हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के दस जवानों का मारा जाना इसका ताजा उदाहरण है। ऐसी घटनाएं छत्तीसगढ़, ओड़ीशा, पश्चिम बंगाल आदि में भी जब-तब होती रहती हैं। छत्तीसगढ़ में नक्सली प्रभाव समाप्त करने के मकसद से सलवा जुडूम जैसे प्रयोग किए गए, सुरक्षा बलों को अधिक चौकस बनाने का प्रयास किया गया, मगर इन सबका कोई खास असर नहीं दिखा। इसी तरह बिहार के जंगली इलाकों में नक्सलियों के दबदबे को खत्म करना कठिन बना हुआ है। सवाल है कि क्यों इस समस्या पर काबू पाने में कोई कामयाबी नहीं मिल पा रही। नक्सली नेटवर्क को भेदने के लिए सुरक्षा बलों को विशेष प्रशिक्षण देने, संचार तंत्र को मजबूत करने और खुफिया तंत्र को प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया। फिर भी स्थिति यह है कि नक्सली संगठनों के पास अत्याधुनिक हथियार और गोला बारूद पहुंच रहे हैं। उनकी योजनाओं का पता लगाना कठिन बना हुआ है। इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि औरंगाबाद के जंगलों में नक्सलियों से निपटने के लिए वहां की सरकार ने कोबरा नाम से विशेष सुरक्षा दस्ता गठित किया है। वही दस्ता जंगलों में गश्त पर था, तो हमला हो गया। इसमें आइईडी विस्फोटक इस्तेमाल किया गया। घटना स्थल से एके सैंतालीस, इंसास राइफलें और ग्रेनेड लांचर बरामद हुए। सवाल है कि ऐसे साजो-सामान नक्सलियों तक किस तरह पहुंच रहे हैं। उनकी आपूर्ति पर सुरक्षा और खुफिया तंत्र नजर क्यों नहीं रख पा रहा है।

नक्सल समस्या पर काबू न पाए जा सकने का बड़ा कारण सरकार का उनके साथ बातचीत का व्यावहारिक सिलसिला शुरू न कर पाना और उन्हें विश्वास में न ले पाना भी है। फिर जिस तरह का तालमेल सुरक्षा बलों, खुफिया एजेंसियों, स्थानीय पुलिस और नागरिकों के साथ बनना चाहिए, वह नहीं बन पा रहा है। नक्सलियों की लड़ाई सैद्धांतिक स्तर पर शुरू हुई थी, पर अब वह अपनी दिशा खो चुकी है। उनके विभिन्न संगठनों से तालमेल हो चुके हैं, जहां से उन्हें गुरिल्ला प्रशिक्षण और साजो-सामान उपलब्ध हो रहे हैं। यह भी छिपी बात नहीं है कि अनेक जगहों पर नक्सलियों के दबदबे से स्थानीय लोग परेशान हैं। वे जबरन वसूली जैसे कामों में भी शामिल हो गए हैं। फिर भी सुरक्षा बल उनकी लड़ाई को कमजोर करने में स्थानीय लोगों का विश्वास नहीं जीत पा रहे हैं, अवैध रास्तों से उपलब्ध हो रहे साजो-सामान पर नजर नहीं रख पा रहे हैं तो यह उनकी भारी विफलता है। स्थानीय लोगों को विश्वास में लेकर काफी हद तक नक्सली प्रभाव को कमजोर किया जा सकता है, पर सुरक्षा बल प्राय: सख्ती अपना कर उनसे सूचनाएं हासिल करने का प्रयास करते देखे जाते हैं। सरकारों ने कभी गंभीरता से नक्सली संगठनों के साथ बातचीत करने का प्रयास नहीं किया। पूर्वोत्तर के कई विद्रोही संगठन जब बातचीत के जरिए अपना हिंसक रास्ता छोड़ने को तैयार हो सकते हैं, तो नक्सलियों को बातचीत के जरिए समझाना क्यों कठिन होना चाहिए! कई मामले सख्ती के बजाय लचीला रुख अपना कर भी हल किए जा सकते हैं। अगर नक्सल समस्या का बारीकी से अध्ययन कर व्यावहारिक रास्ता निकाला जाए तो इस हिंसक प्रवृत्ति पर काबू पाना शायद कठिन नहीं होगा।

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