जनसत्ता संपादकीय : चंदा और सियासत

चुनाव प्रणाली को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के मकसद से पार्टियों को मिलने वाले चंदे पर नजर रखने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है।

Author नई दिल्ली | July 19, 2016 2:51 AM
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चुनाव प्रणाली को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के मकसद से पार्टियों को मिलने वाले चंदे पर नजर रखने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है। इसे लेकर कुछ नियम-कायदे भी बने, पर कम ही पार्टियां उनका पालन करती हैं। कायदे से राजनीतिक दलों को दस हजार रुपए से अधिक चंदा देने वाले व्यक्तियों का ब्योरा सार्वजनिक करना अनिवार्य है, मगर वे ऐसा नहीं करतीं। इस पर कई बार अदालतें एतराज भी जाहिर कर चुकी हैं। बीते मार्च में जब पार्टियों को मिले चंदे का विवरण सामने आया और इस तरह कांग्रेस की आय अधिक दर्ज हुई तो दिल्ली उच्च न्यायालय ने उसके स्रोत के बारे में जानकारी तलब की थी। अज्ञात स्रोत से आने वाले चंदे पर नकेल कसने के मकसद से निर्वाचन आयोग ने भी विधि आयोग को पत्र लिखा था कि उम्मीदवारों के चुनावी शपथ-पत्र में आय के स्रोत की जानकारी का विवरण मांगने के लिए नियमों में संशोधन किया जाना चाहिए। मगर उस पर कोई फैसला नहीं हो पाया है। अब इस संबंध में केंद्रीय सूचना आयोग ने छह राष्ट्रीय दलों भाजपा, कांग्रेस, बसपा, राकांपा, माकपा और भाकपा को नोटिस भेज कर उनके अध्यक्षों को अदालत के समक्ष पेश होने को कहा है। सूचनाधिकार कानून के तहत एक व्यक्ति ने इन दलों से उनकी आय का स्रोत जानना चाहा था, पर ये जानकारी देने में टालमटोल करते रहे। इस पर जब उसने सूचना आयोग से गुहार लगाई तो आयोग ने इन दलों के अध्यक्षों को हाजिर होने को कहा। हालांकि इस कड़ाई के बाद राजनीतिक दलों में चंदे आदि को लेकर कितनी पारदर्शिता आ पाएगी, कहना मुश्किल है।

राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे पर अंकुश न होने की वजह से न सिर्फ चुनावों में तय सीमा से अधिक खर्च लगातार बढ़ता गया है, बल्कि भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिला है। छिपी बात नहीं है कि जो लोग राजनीतिक दलों को गुप्त रूप से भारी चंदा देते हैं, उनके निहित स्वार्थ होते हैं और सत्ता में आने के बाद संबंधित पार्टियां उन्हें उपकृत करने की कोशिश करती हैं। दूसरे, इस तरह बड़े पैमाने पर काले धन को छिपाने का मौका भी मिलता है। कायदे से पार्टियों को हर साल अपनी आय का आॅडिट कराना जरूरी होता है, पर वे इससे कन्नी काटती हैं। कांग्रेस वर्षों से अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से सादगीपूर्ण जीवन जीने, तड़क-भड़क से दूर रहने की अपील करती रही है, पर उसने खुद अपनी आय के स्रोत छिपा कर रखने में कभी गुरेज नहीं किया। इसी तरह भाजपा काले धन पर नकेल कसने का बढ़-चढ़ कर दावा करती रही है, पर उसने अज्ञात स्रोत से आने वाले पैसे से कभी परहेज नहीं किया। बसपा पर पार्टी के लिए चंदे वसूलने को लेकर अनेक मौकों पर अंगुलियां उठ चुकी हैं, पर उसने इसे गंभीरता से कभी नहीं लिया। विचित्र है कि वाम दलों ने भी चंदे के मामले में वही रास्ता अख्तियार किया, जो दूसरे बड़े राष्ट्रीय दल अपनाते रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने जरूर अपनी आय का ब्योरा वेबसाइट पर सार्वजनिक करके राजनीतिक शुचिता की पहल की थी, पर वह दूसरों के लिए अनुकरणीय नहीं बन पाई। दरअसल, जब तक राजनीतिक दल और उनके नेता-कार्यकर्ता अपने खर्चों पर अंकुश लगाने की पहल नहीं करेंगे, चंदे के मामले में उनमें पारदर्शिता आ पाना मुश्किल है। शायद कोई भी दल चुनाव प्रणाली को साफ-सुथरा बनाने को लेकर गंभीर नहीं है।

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