ताज़ा खबर
 

जनसत्ता संपादकीय : मर्यादा का मूल्य

अगर राज्यतंत्र मर्यादित ढंग से काम करे, तो ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए। लेकिन जिस तरह सरकार के लिए मर्यादा-पालन जरूरी है।

Author नई दिल्ली | August 22, 2016 5:31 AM
एमनेस्टी के हालिया आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में मौत की सजाएं देने के मामले में ईरान दूसरा सबसे बड़ा देश रहा है। इस क्रम में पहले स्थान पर चीन रहा है।

दुनिया के कई और देशों की तरह भारत में भी मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें मिलती रहती हैं। फिर, कश्मीर घाटी और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में मानवाधिकार का रिकार्ड ज्यादा खराब रहा है। मानवाधिकारवादी समूहों व मानवाधिकार के लिए काम करने वाले संगठनों का आरोप रहा है कि ऐसी स्थिति का एक बड़ा कारण अफस्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून है, जो सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार देता है। उनके इस आरोप को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। खुद सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों अपने एक फैसले में मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ के आरोप वाले कुछ मामलों की जांच के आदेश दिए। अगर राज्यतंत्र मर्यादित ढंग से काम करे, तो ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए। लेकिन जिस तरह सरकार के लिए मर्यादा-पालन जरूरी है, उसी तरह एनजीओज यानी गैर-सरकारी संगठनों के लिए भी। वैसे यह एक ऐसी सामान्य बात है जिसे लेकर शायद ही कोई मतभेद की गुंजाइश हो और जिसे कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। पर इसे यहां दोहराना आवश्यक जान पड़ रहा है तो इसका ताजा संदर्भ एमनेस्टी इंटरनेशनल के एक आयोजन से जुड़ा घटनाक्रम है।

पिछले दिनों एमनेस्टी ने बंगलुरु में एक सेमिनार किया, जिसका मकसद कश्मीर में मानवाधिकार हनन के प्रति जागरूकता पैदा करना और वहां के पीड़ित परिवारों की व्यथा-कथा उजागर करना था। लेकिन यह आयोजन ठीक से संपन्न भी न हो पाया था कि विवाद में घिर गया। आरोप लगा कि सेमिनार के दौरान वहां भारत-विरोधी नारे लगे। संघ परिवार के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की शिकायत पर पुलिस ने एमनेस्टी के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज किया है। दूसरी तरफ एमनेस्टी का कहना है कि आरोप सरासर झूठे हैं; उसके किसी कर्मी ने कोई नारा नहीं लगाया। एमनेस्टी ने आयोजन की रिकार्डिंग का वीडियो भी पुलिस को सौंपा है जिसकी जांच का नतीजा आना अभी बाकी है।

यों वहां भारत-विरोधी नारा लगा ही नहीं, ऐसा एमनेस्टी का दावा नहीं है। उसकी सफाई यह है कि चूंकि उसके किसी कर्मी ने ऐसा कोई नारा नहीं लगाया, इसलिए उसके खिलाफ दर्ज किया गया आरोप निराधार है। लेकिन सवाल है कि आयोजक क्या इस स्पष्टीकरण के सहारे अपना पल्ला झाड़ सकते हैं? आयोजन कोई रैली, सभा या जुलूस नहीं था; वह एक सेमिनार था जिसमें निमंत्रित लोग ही हिस्सा लेते हैं। फिर, जवाबदेही से एमनेस्टी कैसे बच सकती है? शायद यही वजह होगी कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एन संतोष हेगड़े ने इस गैर-सरकारी संगठन को आरोपित किए जाने को सही ठहराते हुए उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं। पर एमनेस्टी ने अपनी सफाई में यह भी कहा है कि उसका कार्यक्रम एकदम बंद आयोजन नहीं था, यह ऐसा कार्यक्रम था जिसमें लोग आते-जाते रहे।

फिलहाल, यह वाकया जांच का विषय है। लेकिन जिस तरह एबीवीपी के लोगों ने बीते शुक्रवार को एमनेस्टी के बंगलुरु दफ्तर पर धावा बोला, उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। वे पहले ही कई बार विरोध प्रदर्शन कर चुके थे। शायद उतने से उन्हें संतोष न हुआ हो, पर इसका मतलब यह नहीं कि वे खुद सबक सिखाने और कानून हाथ में लेने पर आमादा हो जाएं। एबीवीपी की शिकायत पर ही मामला दर्ज किया गया है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों को आगे का काम करने देना चाहिए। कुछ भी ऐसा नहीं किया जाना चाहिए जिससे देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर आंच आए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App