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संपादकीय: बदहाली के स्कूल

यह स्थिति केवल इटावा जिले की नहीं है। राज्य के कुछ अन्य जिलों से भी स्कूल भवनों के जर्जर हालत में होने और इसकी वजह से बच्चों की पढ़ाई बाधित होने की खबरें आ चुकी हैं। देश के कई अन्य राज्यों में भी तस्वीर इससे अलग नहीं है।

Author February 1, 2019 6:22 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

आजादी के बाद से अब तक देश में शिक्षा की सूरत बदलने के लिए कितने दावे किए गए, कितनी योजनाएं बनीं, यह जगजाहिर रहा है। लेकिन आज भी अगर देश के बहुत सारे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सुरक्षित हालात में पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं तो यह अपने आप में विकास की अवधारणा पर एक बड़ा सवाल है। अकेले उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में जिस तरह बड़ी तादाद में स्कूल भवनों के जर्जर होने की खबर आई है, वह हैरान करने वाली है। खुद राज्य के शिक्षा विभाग की ओर से कराए गए एक सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया कि इटावा में कम से कम दो सौ नौ स्कूलों के भवन खतरनाक हालत तक जर्जर हो चुके हैं और उन्हें नया बनवाने या उनकी मरम्मत को लेकर कोई गंभीर नहीं दिख रहा है। भवनों के गिरने के डर के माहौल में हालत यह है कि कड़ाके की ठंड के मौसम में बच्चों को मजबूरी में खुले आसमान के नीचे बैठ कर पढ़ाई करनी पड़ती है। मौसम ज्यादा खराब होने पर कई बार बच्चों को छुट्टी भी देनी पड़ती है। खबर के मुताबिक स्कूलों के प्रबंधन ने शिक्षा विभाग के पास इससे संबंधित शिकायत भेजी थी। लेकिन स्कूल भवनों की मरम्मत को लेकर संबंधित अधिकारियों के बार-बार दिए गए आश्वासन अब तक कोरे साबित हुए।

अब स्वाभाविक ही खतरनाक हालत में पहुंच चुकी इमारतों में चलने वाले स्कूलों की खबर पर मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है। आयोग ने इसे स्कूल के विद्यार्थियों और शिक्षकों के मानवाधिकारों के हनन का मामला मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है और चार हफ्ते के भीतर विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। यह स्थिति केवल इटावा जिले की नहीं है। राज्य के कुछ अन्य जिलों से भी स्कूल भवनों के जर्जर हालत में होने और इसकी वजह से बच्चों की पढ़ाई बाधित होने की खबरें आ चुकी हैं। देश के कई अन्य राज्यों में भी तस्वीर इससे अलग नहीं है। हालांकि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने और दोपहर का भोजन या कई अन्य योजनाओं की वजह से स्कूलों में बच्चों की तादाद और उपस्थिति बढ़ी है। लेकिन सवाल है कि अगर स्कूलों की इमारतों की स्थिति ठीक नहीं है, मजबूरी में बच्चों को खुले आसमान के नीचे पढ़ना पड़ता है, बुनियादी सुविधाओं का अभाव है तो वहां पढ़ाई के लिए जाने वाले बच्चों का कैसा भविष्य तैयार हो रहा है!

यह विडंबना है कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए आठ साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन आज भी स्कूलों की दशा की वजह से भारी तादाद में बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि कई जगहों पर स्कूलों की इमारतें पर्याप्त सुरक्षित नहीं हैं और वहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव होता है। इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता और स्तर पर भी पड़ता है। एक अध्ययन में यह पाया गया था कि बीच में स्कूली पढ़ाई छोड़ने वालों में ज्यादा संख्या लड़कियों की होती है और वे शौचालय और पीने के साफ पानी के अभाव की वजह से भी स्कूल छोड़ देती हैं। यह समझना मुश्किल है कि दूसरे कई गैरजरूरी मदों में पैसा बहाने वाली सरकारों को सुरक्षित और बुनियादी सुविधाओं से लैस स्कूल भवनों का निर्माण कोई प्राथमिक काम क्यों नहीं लगता है। विकास के तमाम दावों के बीच आज भी देश के कई इलाकों में मौजूद यह समस्या एक बड़ा सवाल है कि स्कूली शिक्षा की इस तस्वीर के रहते हमारी उपलब्धियों की क्या अहमियत रह जाती है!

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