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संपादकीय: अवरुद्ध सूचनाएं

यह अकारण नहीं है कि पिछले साढ़े चार-पांच सालों में सूचनाधिकार के तहत मांगी और प्राप्त की जाने वाली सूचनाओं की दर काफी कम हो गई है। अब तो कई बार स्थिति यह भी देखी जाती है कि इस कानून के तहत मांगी गई जानकारी को संबंधित विभाग यह कह कर ठुकरा देते हैं कि गोपनीयता के चलते वह जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती।

Author February 16, 2019 5:36 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

सूचना का अधिकार कानून बना था तो उम्मीद जगी थी कि इससे भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही सुनिश्चित होगी, वे अपने कर्तव्यों के प्रति सावधान होंगे। शुरू में कुछ सालों तक ऐसा देखा भी गया। मगर अब उस कानून का असर खत्म-सा हो गया लगता है। इसकी एक वजह यह भी है कि केंद्र और राज्यों में सूचना आयुक्तों के पद समय से भरे नहीं जाते। कई जगह इन पदों को भरने में जानबूझ कर लापरवाही बरती जाती है। इसी के मद्देनजर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में इतनी देर क्यों होती है? क्यों इस पद पर सिर्फ नौकरशाहों की नियुक्ति की जाती है, इसके लिए दूसरे क्षेत्रों के लोगों को क्यों नहीं चुना जाता! अदालत ने सुझाव दिया है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति निर्वाचन आयुक्त की तरह होनी चाहिए। किसी सूचना आयुक्त के अवकाश ग्रहण करने से दो महीने पहले ही उसकी जगह दूसरे व्यक्ति को तैनात करने की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए। इसके लिए खोज समिति को तत्पर रहना चाहिए।

हालत यह है कि केंद्र में मुख्य सूचना आयुक्त सहित ग्यारह सूचना आयुक्त होने चाहिए, पर कई सालों से यह संख्या पूरी नहीं हो पाती। यही स्थिति राज्यों में है। अवकाश प्राप्त सूचना आयुक्त की जगह नई नियुक्ति की प्रक्रिया लंबे समय तक रुकी रहती है। इसका नतीजा यह हुआ है कि करीब साढ़े तेईस हजार शिकायतें निपटारे का इंतजार कर रही हैं। सूचना आयुक्त का काम सूचनाधिकार संबंधी शिकायतों का निपटारा करना होता है। यों इस कानून के तहत देश का कोई भी नागरिक किसी भी कामकाज से जुड़ी कोई जानकारी मांग सकता है और उसे उपलब्ध कराना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। अगर वह मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने में किसी प्रकार की टाल-मटोल करता है, तो उसके खिलाफ दंड के प्रावधान हैं। जब यह कानून बना था तो शुरुआती दिनों में इसके चलते अनेक बड़े खुलासे हुए। इससे सरकारी कर्मचारियों में अपने कामकाज के प्रति कुछ मुस्तैदी भी देखी गई, पर उनमें हमेशा इस कानून का भय बना रहता था, इसलिए जल्दी ही सूचनाएं उपलब्ध कराने को लेकर वे कोई न कोई गली निकालने लगे। सरकारें भी इस कानून के चलते असहज देखी गईं। जो लोग भ्रष्ट तरीकों से अपना काम कराते थे, उनके हाथ बंध गए। यही वजह है कि कई राज्यों में सूचनाधिकार कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले भी हुए।

इस तरह सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में जानबूझ कर की जाने वाली देरी की कुछ वजहें समझना मुश्किल नहीं है। यह अकारण नहीं है कि पिछले साढ़े चार-पांच सालों में सूचनाधिकार के तहत मांगी और प्राप्त की जाने वाली सूचनाओं की दर काफी कम हो गई है। अब तो कई बार स्थिति यह भी देखी जाती है कि इस कानून के तहत मांगी गई जानकारी को संबंधित विभाग यह कह कर ठुकरा देते हैं कि गोपनीयता के चलते वह जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। या वे लंबे समय तक उस आवेदन को रोक कर रखते हैं, जबकि नियम के मुताबित निर्धारित समय सीमा के भीतर मांगी गई सूचना उपलब्ध कराना उनकी जिम्मेदारी है। कहना न होगा, इस तरह सूचना के अधिकार कानून को एक तरह से अप्रभावी बनाने का प्रयास होता रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती से उम्मीद जगी है कि यह कानून एक बार फिर से अपने प्रभावी रूप में दिखेगा।

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