पश्चिम एशिया में संघर्ष का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। ऊर्जा संकट और व्यापार में बाधाओं के कारण पैदा हुई चुनौतियों का दायरा बढ़ता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और मुद्रा (रुपये) के लगातार कमजोर होने से देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। उधर, अमेरिका और ईरान के तल्ख तेवरों से शांति समझौते पर बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है।

ऐसे में अब मौजूदा संकट से निपटने के लिए वैकल्पिक उपायों को अमल में लाना जरूरी हो गया है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते रविवार को देश की जनता से पेट्रोलियम उत्पादों का संयमित तरीके से उपयोग करने, सोने की खरीदारी से परहेज करने, गैर जरूरी विदेश यात्रा से बचने और स्थानीय वस्तुओं को प्राथमिकता देने का आह्वान किया है।

सरकार का मानना है कि इन सभी प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत दुनिया भर में जारी ऊर्जा संकट का प्रभावी ढंग से सामना कर सकेगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी, जिससे सरकारी कोष को मजबूत बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसमें दोराय नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में भारत सौर ऊर्जा के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल हो गया है, लेकिन देश की जरूरत मुख्य तौर पर अभी भी जीवाश्म ईंधन से पूरी की जा रही है।

ऐसे में जरूरी है कि मौजूदा संकट के दौरान आयातित ऊर्जा संसाधनों का उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से और वास्तविक आवश्यकता के अनुसार ही किया जाए। गौरतलब है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण होर्मुज जलमार्ग के बंद होने से तेल की आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है, जिससे ऊर्जा का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

खबरों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों से वैश्विक ऊर्जा कीमतों में हुई बढ़ोतरी से देश की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है, जिस कारण आने वाले दिनों में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ सकते हैं। हालांकि, अभी तक सरकार ने पेट्रोल-डीजल और घरेलू रसोई गैस के दामों को नियंत्रित करने के प्रयास किए हैं, लेकिन संकट गहराने से अब यह सब आसान नहीं होगा। इसके लिए वैकल्पिक उपायों पर गंभीरता से काम करना होगा, ताकि प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सके।

प्रधानमंत्री के आह्वान से इस बात के संकेत भी मिल रहे हैं कि आने वाले समय में रोजमर्रा के इस्तेमाल की जरूरी वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। यानी कच्चे तेल से जुड़ी महंगाई, पैकेजिंग सामग्री और ईंधन लागत में बढ़ोतरी के बीच साबुन, डिटर्जेंट, बिस्किट, पैकेट बंद खाद्य पदार्थ और पेय उत्पाद जैसी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।

खबरों के मुताबिक, आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करने वाली देश की प्रमुख कंपनियां मुनाफे पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए चरणबद्ध तरीके से दाम बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। प्रधानमंत्री के ये सुझाव कि कोरोना काल की तरह घर से काम करने समेत अन्य तरीकों पर फिर से अमल करना, खाद्य तेल की खपत कम करना और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाना, यह सब मौजूदा संकट की गंभीरता को दर्शाता है।

यह सही है कि संकट जब गंभीर हो, तो उससे निपटने के लिए सरकारी उपायों के साथ-साथ आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे उसमें सक्रिय भागीदारी निभाएं। मगर इस सब के बीच यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि इस तरह के उपायों का समाज के निचले और मध्य वर्ग की आजीविका पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।