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संपादकीय: आग के ठिकाने

कायदे से व्यावसायिक और सार्वजनिक भवनों में अग्निशमन, भूकम्प आदि स्थितियों से निपटने संबंधी इंतजामों की नियमित जांच होनी चाहिए। उसी के अनुसार उनका लाइसेंस नवीकृत किया जाता है। अगर करोलबाग वाले होटल की संजीदगी से जांच की गई होती, तो शायद इतना बड़ा हादसा नहीं हो पाया होता।

Author February 13, 2019 4:57 AM
होटल अर्पित में लगी भीषण आग फोटो सोर्स – ट्विटर/ANI

दिल्ली में करोलबाग इलाके के एक होटल में लगी आग से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि शहरों के व्यावसायिक और सार्वजनिक भवनों, भीड़भाड़ वाली जगहों पर किस कदर सुरक्षा इंतजामों में लापरवाही बरती जाती है। जिस होटल में आग लगी, उसमें करीब साठ कमरे हैं। उसमें करीब सौ यात्री ठहरे हुए थे और पंद्रह-बीस होटलकर्मी सेवा में तैनात थे। आग तड़के चार बजे लगी। आग लगने का कारण फिलहाल बिजली के तारों का गरम होकर जल उठना बताया जा रहा है। इस हादसे में करीब सत्रह लोगों के मारे जाने और पैंतीस लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की पुष्टि हुई है। लोगों की मौत दम घुटने की वजह से हुई बताई जा रही है। सीढ़ियां लकड़ी की बनी हुई थीं, जो आग की चपेट में आ गई थीं। इसकी वजह से बहुत सारे लोग सीढ़ी के रास्ते नीचे नहीं उतर पाए। कुछ लोगों ने खिड़की से छलांग लगाने की कोशिश की, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। हालांकि घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और दिल्ली सरकार ने मृतकों के परिजनों को पांच लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा भी कर दी है। पर समझना मुश्किल है कि होटल में सुरक्षा इंतजामों की अनदेखी को कैसे नजरअंदाज कर दिया गया था!

बड़े शहरों में मुसाफिरों की आवाजाही अधिक होने की वजह से होटल, मोटल, गेस्ट हाउस आदि का कारोबार बड़े पैमाने पर चलता है। दिल्ली के कई इलाकों में, जो रेलवे स्टेशनों, हवाई अड््डे और किसी बाजार या बड़े व्यावसायिक केंद्र के आसपास हैं, संकरी गलियों और बहुत छोटी जगहों पर लोगों ने होटल खड़े कर लिए हैं। इंटरनेट साइटों आदि के जरिए सस्ती दरों पर रुकने-ठहरने की सुविधा उपलब्ध कराने के नाम पर खूब कमाई कर रहे हैं। मगर स्थिति यह है कि उनमें सुरक्षा संबंधी नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं। न तो उनकी बनावट अनुकूल है, न उनके पास आपात स्थितियों से पार पाने के इंतजाम हैं। आजकल वातानुकूलित कमरों का चलन है, इसलिए ज्यादातर इमारतें इस तरह बनाई जा रही हैं, जिनमें बाहर की हवा अंदर और अंदर की बाहर जाने तक की गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। चारों तरफ से कांच से बंद होती हैं। करोलबाग के जिस होटल में आग लगी, उसमें भी ऐसा ही था। वातानुकूलित इमारत होने के कारण, जब उसमें आग लगी, तो धुंआ अंदर ही घुमड़ता रहा और दम घुटने से कई लोगों की मौत हो गई।

कायदे से व्यावसायिक और सार्वजनिक भवनों में अग्निशमन, भूकम्प आदि स्थितियों से निपटने संबंधी इंतजामों की नियमित जांच होनी चाहिए। उसी के अनुसार उनका लाइसेंस नवीकृत किया जाता है। अगर करोलबाग वाले होटल की संजीदगी से जांच की गई होती, तो शायद इतना बड़ा हादसा नहीं हो पाया होता। आजकल सार्वजनिक भवनों में आग की स्थिति से निपटने के लिए स्वचालित अग्निशमन संयंत्र लगाना अनिवार्य है। जैसे ही भवन में कहीं धुआं उठता है, उसका अलार्म बजना शुरू हो जाता है। फिर एक निश्चित समय के बाद अग्निशमन संयंत्र चालू हो जाता है, पानी के फव्वारे चलने लगते हैं। अगर करोलबाग के होटल में आग पर काबू पाने में अग्निशमन विभाग को इतनी मशक्कत करनी पड़ी तो जाहिर है कि वहां ऐसा कोई इंतजाम नहीं था। इसलिए होटल में लगी आग के लिए केवल होटल प्रबंधक दोषी नहीं हैं, इसके लिए सरकारी तंत्र भी समान रूप से दोषी है।

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