ईरान पर इजरायल और अमेरिका के साझा हमले के बाद हाल ही में जब युद्धविराम पर सहमति बनी थी, तब एक उम्मीद पैदा हुई कि संभवत: दोनों पक्ष जल्दी ही स्थायी समाधान तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। हालांकि इस बीच लेबनान पर इजरायल के हमले जारी रहने की वजह से युद्धविराम खतरे में पड़ता दिखा। इसके बावजूद पाकिस्तान के इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता से यह उम्मीद बंधी थी कि संभवत: युद्ध खत्म होने की कोई राह निकलेगी।

मगर वार्ता की विफलता की जैसी जैसी खबरें आईं, वे निराश करने वाली हैं। दरअसल, रविवार को बातचीत खत्म होने के बाद अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच फासला कम करने और समझौता कराने की पूरी कोशिश की गई, लेकिन हम किसी समझौते तक नहीं पहुंच सके। दूसरी ओर, ईरान की ओर से कहा गया कि अमेरिका की ह्यअत्यधिक गैरवाजिब मांगोंह्ण और उसके रुख में लचीलापन न होने के कारण दोनों देशों के बीच हुई बातचीत किसी समझौते के बिना खत्म हो गई।

जाहिर है, इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच लगभग इक्कीस घंटे चली बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। इसीलिए इसे एक विफल वार्ता कहा जा रहा है। सवाल है कि जब दोनों पक्षों के सामने विवाद के मुद्दे स्पष्ट थे, तो क्या वे इन पर व्यावहारिक रुख अख्तियार करते हुए युद्ध खत्म करने के मकसद के साथ एक कदम पीछे, चार कदम आगे के सूत्र पर काम नहीं कर सकते थे।

अमेरिका किसी भी समझौते तक पहुंचने के लिए ईरान से परमाणु हथियार नहीं बनाने और इस क्षमता को हासिल करने के लिए जरूरी उपकरण जुटाने से दूर रहने का आश्वासन चाहता है। वहीं ईरान का कहना है कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए कई रचनात्मक योजनाएं पेश कीं, लेकिन अमेरिकी ईरान का विश्वास हासिल नहीं कर सके। जब युद्ध खत्म करने की इच्छा के पीछे ईमानदारी हो, तो वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए शर्तों को पूरा किए जाने की मांग के जिद में तब्दील होने से बचने के हालात बनाने की जरूरत होती है।

बातचीत के प्रमुख मुद्दों में ईरान में युद्ध का पूरी तरह अंत, ईरान की जब्त संपत्तियां परमाणु कार्यक्रम, युद्ध मुआवजा, प्रतिबंधों को हटाना और होर्मुज जलमार्ग शामिल थे। मगर क्या इन मसलों पर दोनों पक्षों की ओर से व्यावहारिक नजरिया अपनाए बिना किसी ठोस हल तक पहुंचा जा सकता है? यह समझना मुश्किल है कि जब ईरान के मुताबिक चौदह दिनों के युद्धविराम की शर्तों में लेबनान पर भी हमले रोकना भी शामिल था, तो इजरायल को लेबनान के नागरिक ठिकानों पर हमला करके शांति की उम्मीद पर चोट करने की क्या जरूरत थी।

गौरतलब है कि इजरायल के इसी हमले के बाद ईरान ने दोबारा होर्मुज जलमार्ग को बंद करने की घोषणा कर दी थी। सिर्फ इस जलमार्ग के बाधित होने की वजह से भारत सहित दुनिया के बहुत सारे देशों में प्राकृतिक गैस और तेल की आपूर्ति पर व्यापक असर पड़ा है। यह सही है कि अमेरिका और ईरान के जैसे संबंध रहे हैं, उसमें सब कुछ ठीक हो जाने की उम्मीद करना मुश्किल है। मगर लंबे अरसे के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत का अवसर निकला था।

इसलिए शांति वार्ता के नाकाम होने के बावजूद जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले कम से कम युद्धविराम को बनाए रखने के लिए सभी पक्ष संवेदनशील रहें। और किसी भी पक्ष की ओर से आक्रामक बयानबाजी के बजाय स्थायी शांति के लिए संवाद की गुंजाइश बनाने के लिए हर स्तर पर पहलकदमी हो।

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तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने कहा, “अगर पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध में मध्यस्थता नहीं कर रहा होता, तो हम इजरायल को उसकी औकात दिखा देते।” पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें