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संपादकीय: अदालत की भाषा

अदालत का कामकाज इस तरह होना चाहिए कि वह केवल जज और वकील के बीच का संवाद बन कर न रह जाए, उसमें वादी और प्रतिवादी की भी हिस्सेदारी होनी चाहिए। मगर वह केवल कुछ गवाहियों तक सीमित रह जाती है।

Author February 12, 2019 5:33 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

हमारे यहां अदालत की भाषा को लेकर अनेक मौकों पर सवाल उठते रहे हैं कि यह आम आदमी की समझ से परे है। कई बार यह भी मांग उठी कि उच्च अदालतों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी मुकदमे दायर करने और फैसले सुनाने का प्रावधान होना चाहिए। मगर इस मामले में अभी तक कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पाया है। जबकि अबू धाबी सरकार ने अपने यहां अरबी और अंग्रेजी के अलावा हिंदी को भी अदालतों की तीसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता दे दी है। अबू धाबी में करीब तीस फीसद भारतीय रहते हैं। इन लोगों को शिकायतें, दावे और अनुरोध पेश करने में सुविधा हो और अदालती कार्यवाही में सहूलियत तथा न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे, इसलिए वहां की सरकार ने यह फैसला किया। अबू धाबी का यह फैसला भारतीय न्यायिक सेवा के लिए नजीर हो सकता है।

भारत की निचली अदालतों में तो कामकाज स्थानीय भाषा में होता है, पर उच्च और उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी ही मुख्य भाषा है। हालांकि उच्च न्यायालयों में मांगने पर हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में फैसले की प्रति उपलब्ध कराने का प्रावधान है, पर ज्यादातर जगहों पर कामकाज अंग्रेजी में ही होता है। इसका नतीजा यह होता है कि लोगों को सामान्य अपील या आवेदन, शिकायत आदि के लिए भी वकीलों पर निर्भर रहना पड़ता है। फिर कानूनी शब्दावली इस कदर जटिल और भ्रामक है कि वह आम आदमी की समझ से परे है। वकीलों और जजों के बीच होने वाली जिरह अपील करने वाला व्यक्ति समझ ही नहीं पाता। वह जान ही नहीं पाता कि वह जो बात कहना चाहता है, वही बात उसका वकील कह रहा है या नहीं। इस तरह उच्च न्यायालयों की कार्यवाहियों में पारदर्शिता नहीं आ पाती। मुकदमे की मुख्य कड़ी वकील होता है। इसी का नतीजा है कि ऊपरी अदालतों में वकील अपने मुवक्किलों से मनमानी फीस वसूलते हैं, जिसका कोई तार्किक आधार नहीं समझ आता। समझना मुश्किल है कि जब तमाम कार्यालयों में हिंदी में कामकाज पर जोर दिया जाता है, तो फिर ऊपरी अदालतों में इसे अनिवार्य क्यों नहीं किया जा सकता!

दरअसल, हमारे यहां अदालत की भाषा अंग्रेजी इसलिए भी बनी हुई है कि ऊपरी अदालतों के ज्यादातर वकील और जज इसी भाषा में काम करने के अभ्यस्त हैं। हालांकि जब वकीलों के पास लोग किसी मुकदमे के सिलसिले में जाते हैं, तो वे अपनी बात हिंदी या अपनी क्षेत्रीय भाषा में ही बताते-समझते हैं, पर जब अदालत में जिरह करने या कागजात तैयार करने की बात आती है, तो अंग्रेजी का ही सहारा लिया जाता है। ऐसा नहीं कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं में कानून की पढ़ाई नहीं होती या इन भाषाओं में कानून संबंधी तकनीकी शब्दावली का विकास नहीं हुआ है। पर ब्रिटिश जमाने से सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी बनी हुई है। अदालत का कामकाज इस तरह होना चाहिए कि वह केवल जज और वकील के बीच का संवाद बन कर न रह जाए, उसमें वादी और प्रतिवादी की भी हिस्सेदारी होनी चाहिए। मगर वह केवल कुछ गवाहियों तक सीमित रह जाती है। बाकी समय लोगों को समझ ही नहीं आता कि उनके मुकदमे में क्या हो रहा है। फिर जब फैसला आता है, तो वे उसे खुद पढ़ कर समझ तक नहीं सकते, किसी वकील या कानून के जानकार व्यक्ति से मदद लेनी पड़ती है। अबू धाबी से नजीर लेकर भारत में भी आम आदमी की भाषा को अदालत की भाषा बनाने का प्रयास होना चाहिए।

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