दिल्ली में साकेत के पास एक इलाके में शनिवार को पांच मंजिला इमारत ढह जाने से पांच विद्यार्थियों सहित छह लोगों की मौत की खबर ने फिर यही साबित किया है कि सरकारी तंत्र के भीतर किस हद तक लापरवाही और गैरजिम्मेदारी का आलम पसरा हुआ है। इस घटना में कई लोग घायल भी हो गए। बचाव अभियान में चौदह लोगों को बाहर निकाला गया।

इस हादसे से सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब यह हादसा हुआ, उस समय इमारत की ऊपरी मंजिल पर निर्माण कार्य किसकी अनुमति से हो रहा था। नियमों का उल्लंघन कर इसकी मंजूरी किस स्तर पर दी गई? हालांकि नगर निगम के दो अभियंताओं को निलंबित कर दिया गया है। इतने बड़े हादसे पर यह कार्रवाई बहुत छोटी है।

कायदे से उन सभी पर कार्रवाई होनी चाहिए, जिन पर उस भवन के निर्माण और नक्शे की मंजूरी देने का जिम्मा था। मजिस्ट्रेट के स्तर पर जांच के बाद संबंधित अधिकारियों को छानबीन के घेरे में लाया जाना चाहिए।

मगर वास्तव में यह प्रशासन और नगर निकाय की लापरवाही का एक और ज्वलंत उदाहरण है। सवाल है कि इमारत जर्जर हो गई थी, तो संबंधित विभाग ने समय रहते इसे खाली क्यों नहीं कराया। अगर यह प्राथमिक कदम उठा लिया गया होता, तो एक बड़ा हादसा टल सकता था

कोई भी इमारत एक दिन में अचानक नहीं गिरती। उसमें संरचनात्मक कमजोरी धीरे-धीरे सामने आ रही होती है। साकेत में जो इमारत ढह गई, समय रहते उसके मालिक और नगर निगम के अभियंताओं ने सजगता क्यों नहीं बरती और निर्माण मानकों का उल्लंघन क्यों होने दिया गया। उस इमारत में अवैध निर्माण किए जाते रहे और अधिकारी आंखें मूंदे रहे, तो दरअसल यह आपराधिक लापरवाही है।

साकेत में हुई घटना पूरी दिल्ली के लिए सबक होनी चाहिए। यहां कई व्यावसायिक और रिहाइशी इमारतें हैं जो भवन निर्माण की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। पिछले दो-तीन दशकों में राजधानी में भवनों के निर्माण का जिस तरह व्यावसायीकरण हुआ है, उसके नतीजे सामने आने लगे हैं। जर्जर होती कोई इमारत कब ढह जाए, कहा नहीं जा सकता। अवैध और जर्जर इमारतों का पूरी दिल्ली में सर्वे और निरीक्षण होना चाहिए, ताकि समय रहते नागरिकों की जान बच सके।