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धरोहर और उदासीनता

ऐतिहासिक महत्त्व की निजी संपत्तियों को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित करने के सरकारी प्रयास की तो क्या उम्मीद की जाए, सरकारें खुद अपने यहां मौजूद ऐतिहासिक महत्त्व के भवनों, जगहों, स्मारकों आदि को संरक्षित नहीं कर पातीं।

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धरोहरें संभालने के मामले में हमारे देश में प्राय: उदासीनता ही दिखाई देती है। निजी संपत्तियों से लेकर सार्वजनिक इमारतों तक के मामले में यही आलम है। हिंदी फिल्म जगत में इतिहास रचने वाला आरके स्टूडियो का बिक जाना इसकी ताजा मिसाल है। आरके स्टूडियो की स्थापना अभिनेता, फिल्म निर्माता राज कपूर ने पाई-पाई जोड़ कर की थी। इस स्टूडियो में अनेक नामचीन फिल्मों का फिल्मांकन हुआ। सिने दर्शकों में इस स्टूडियो को लेकर एक भावनात्मक लगाव था। मगर व्यावसायिक दबाव और बदलते जमाने की कारोबारी होड़ में यह स्टूडियो अपने हाल पर बिसूरता रहा। राज कपूर के न रहने के बाद उनके बेटे और दूसरे परिजन इसकी देखभाल नहीं कर पाए। काफी समय तक कपूर खानदान की बहू जेनिफर नाटकों का आयोजन कर इस स्टूडियो की विरासत को बचाए रखने का प्रयास करती रहीं, पर वे भी विफल रहीं। एक टीवी कार्यक्रम की शूटिंग के दौरान स्टूडियो में आग लगी और आखिरकार कपूर परिवार ने इसे बेचने का फैसला किया। अब उस पर गोदरेज समूह का स्वामित्व हो गया है। गोदरेज कंपनी वहां आलीशान रिहाइश और कारोबार केंद्र बनाएगी।

इस जमाने में जब मुंबई फिल्म निर्माण का बड़ा केंद्र है, फिल्मों का कारोबार काफी बढ़ चुका है। इसमें तकनीक का भरपूर उपयोग होने लगा है। बहुत सारे फिल्मकार जगह न मिलने के कारण मुंबई से बाहर फिल्मांकन के लिए जगह तलाश करते हैं। अगर आरके स्टूडियो को बदलते समय के अनुसार कारोबार की तरह विकसित किया जाता, तो आज उसकी यह दशा न होती, जो हुई है। मगर राज कपूर के वारिस अभिनय और दूसरे जरिए से अपने जीवन-यापन करते रहे, स्टूडियो की विरासत को बचाए रखने को लेकर उदासीन ही देखे गए। कुछ पेचीदगियां इसके स्वामित्व को लेकर भी थीं, पर उन्हें सुलझाना कठिन नहीं माना जा सकता। दूसरे, इसे संभालने में आर्थिक तंगी भी बड़ा कारण नहीं हो सकता था। आजकल फिल्म स्टूडियो बनाने, संभालने के लिए आसानी से कर्ज उपलब्ध हो जाता। बस, जरूरत थी तो इसे कारोबारी शक्ल देने की, जो कपूर खानदान नहीं दे पाया। काश, इसे कोई ऐसी कंपनी लेती, जो उसकी गरिमा को अक्षुण्ण रख पाती। वहां रिहाइशी और कारोबारी केंद्र बनने से स्टूडियो की पहचान तो खत्म ही हो जाएगी। दूसरे अनेक देशों में ऐसी विरासतों को संभालने में सरकार भी दखल देती है, मगर हमारे यहां ऐसी कोई रीति-नीति नहीं है। इसी का नतीजा है कि निजी प्रयासों से बने ऐसे कई ठिकाने बिला गए।

ऐतिहासिक महत्त्व की निजी संपत्तियों को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित करने के सरकारी प्रयास की तो क्या उम्मीद की जाए, सरकारें खुद अपने यहां मौजूद ऐतिहासिक महत्त्व के भवनों, जगहों, स्मारकों आदि को संरक्षित नहीं कर पातीं। भारत में पर्यटन के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, पर उसे ध्यान में रख कर न तो ऐतिहासिक महत्त्व की चीजों को सहेजने का कोई उत्साहजनक प्रयास दिखता है, न उनके बारे में विश्व स्तर पर प्रचार-प्रसार का कोई जतन। अब ऐतिहासिक महत्त्व की इमारतों की साज-संभाल की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को सौंपने का एक नया चलन शुरू हुआ है। लाल किला इसका ताजा उदाहरण है। ऐसे में निजी प्रयास से बनी मशहूर जगहों-भवनों को बचाने में भला सरकारी दखल की क्या बात की जा सकती है। ऐसी जगहें सिर्फ सजावट की वस्तु नहीं होतीं, वे अपने जमाने का इतिहास भी होती हैं। इसलिए इस मामले में व्यावहारिक नीति पर विचार की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।

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