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संपादकीय: प्रत्यर्पण की उम्मीद

माल्या जिस तरह भारत से भागा और उसके प्रत्यर्पण के मामले में सरकार ने शुरू में जैसी शिथिलता दिखाई, उससे भी कई सवाल खड़े होते हैं। अगर भारत की खुफिया और जांच एजेंसियां जरा भी सतर्कता दिखातीं तो माल्या के लिए देश छोड़ना आसान नहीं होता।

Author February 7, 2019 4:31 AM
भगोड़े विजय माल्या की फाइल फोटो। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

बैंकों का पैसा डकार कर विदेश भागने वाले आर्थिक अपराधियों को वापस लाने की दिशा में सरकार और जांच एजेंसियों के प्रयासों के नतीजे अब सामने आने लगे हैं। इस दिशा में पहली सफलता तो यही है कि विजय माल्या को ब्रिटेन से भारत लाने का रास्ता खुला। लंबी न्यायिक प्रक्रिया और कानूनी पेचीदगियों की वजह से भले इस प्रक्रिया में और देर लगे, लेकिन माल्या के प्रत्यर्पण को हरी झंडी देकर ब्रिटेन की सरकार ने एक रास्ता तो बनाया। लंदन की मेट्रोपॉलिटिन अदालत में प्रत्यर्पण संबंधी मुकदमा हारने के बाद माल्या को भारत प्रत्यर्पित करने के आदेश पर ब्रिटेन के गृहमंत्री ने दस्तखत कर दिए। इसी से भारत को उम्मीद बंधी है कि अब माल्या सहित दूसरे भगोड़ों को जल्दी भारत लाना संभव हो सकेगा। तीन मार्च, 2016 को माल्या के भारत से भागने के एक साल बाद फरवरी, 2017 में भारत ने ब्रिटेन से उसके प्रत्यर्पण का अनुरोध किया था। माल्या के मामले में अब तक भारत को जो कुछ हासिल हुआ है उसे एक बड़ी कूटनीतिक जीत इसलिए भी माना जा रहा है कि दुनिया में ब्रिटेन के प्रत्यर्पण कानून सबसे जटिल हैं और इसी का फायदा उठा कर अपराधी वहां शरण लेते हैं।

माल्याके प्रत्यर्पण को ब्रिटिश सरकार ने हरी झंडी भले दे दी हो, लेकिन उसकी भारत वापसी इतनी आसान भी नहीं लग रही। माल्या के पास बचाव के कानूनी रास्ते हैं जो उसकेप्रत्यर्पण में बाधा बन सकते हैं। पिछले साल दिसंबर में लंदन की अदालत ने जब माल्या के खिलाफ फैसला सुनाया था और उसके प्रत्यर्पण का आदेश दिया था तब माल्या ने उस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती नहीं दी थी। उसे उम्मीद थी कि ब्रिटिश सरकार उसका साथ देगी। लेकिन अब माल्या के पास गृहमंत्री के प्रत्यर्पण के आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार है और इसका वह पूरा फायदा लेगा। इसके खिलाफ वह ब्रिटेन के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है और चाहे जितना जल्द इस प्रक्रिया को पूरा किया जाए, इसमें कम से कम छह महीने तो लग ही सकते हैं। ऐसे में आम चुनाव से पहले उसे भारत लाने की सरकार की कोशिशों को झटका लग सकता है।

माल्या जिस तरह भारत से भागा और उसके प्रत्यर्पण के मामले में सरकार ने शुरू में जैसी शिथिलता दिखाई, उससे भी कई सवाल खड़े होते हैं। अगर भारत की खुफिया और जांच एजेंसियां जरा भी सतर्कता दिखातीं तो माल्या के लिए देश छोड़ना आसान नहीं होता। पिछले साल लंदन की अदालत के बाहर माल्या ने कहा था कि आने से पहले वह वित्तमंत्री से मिला था, हालांकि वित्तमंत्री ने बाद में इसका खंडन किया। माल्या के भागने से लेकर उसके प्रत्यर्पण अनुरोध में भारत सरकार ने एक साल लगा दिया। सरकार को शायद यह उम्मीद रही होगी कि माल्या खुद आ जाएगा और बैंकों का पैसा चुका देगा! माल्या जैसे तमाम बड़े घोटालेबाज भारत के लचर तंत्र का फायदा उठा कर ही देश से भागे हैं। पीएनबी घोटाले को अंजाम देने वाले मेहुल चौकसी ने भाग कर एंटीगुआ की नागरिकता ले ली और भारत को ठेंगा दिखा दिया। अब भारत सरकार के पास हाथ-पैर मारने के अलावा कुछ नहीं बचा है। लेकिन जिस तरह से जांच एजेंसियों और प्रवर्तन निदेशालय ने माल्या, नीरव मोदी जैसे भगोड़ों के खिलाफ अब सख्ती दिखानी शुरू की है,उससे यह संदेश तो गया है कि अगर सत्ता तंत्र चाहे और ईमानदारी से काम करे तो ऐसे अपराधियों पर लगाम लगा पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। बस इच्छाशक्ति की जरूरत है।

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