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संपादकीय: दोहरेपन की हद

जम्मू-कश्मीर की समस्या में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और उसके नेताओं का कैसा दखल है, इससे पाकिस्तान अनजान नहीं है। मगर वहां के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को हुर्रियत के नेता मीरवाइज उमर फारूक से टेलीफोन पर बात करने में कोई हिचक नहीं होती है।

Author February 1, 2019 5:57 AM
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। (file pic)

पाकिस्तान में नई सरकार के गठन के बाद शुरुआती दौर में प्रधानमंत्री के रूप में इमरान खान का जो रुख सामने आता दिखा, उससे यह उम्मीद जरूर पैदा हुई थी कि संभवत: वे भारत के साथ संबंधों को एक नया आयाम देंगे। लेकिन व्यवहार में पाकिस्तान की ओर से की गई अवांछित हरकतों से ऐसा लगता नहीं है कि वह दोस्ताना रिश्तों को लेकर गंभीर है। वरना यह कैसे संभव हो पा रहा है कि कश्मीर में भारत अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों की जिस चुनौती से जूझ रहा है, पाकिस्तान को उनसे संबंध बनाए रखना जरूरी लगता है। जम्मू-कश्मीर की समस्या में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और उसके नेताओं का कैसा दखल है, इससे पाकिस्तान अनजान नहीं है। मगर वहां के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को हुर्रियत के नेता मीरवाइज उमर फारूक से टेलीफोन पर बात करने में कोई हिचक नहीं होती है। सवाल है कि अगर पाकिस्तान के शीर्ष स्तर के नेता की ओर से हुर्रियत के नेता को तरजीह देना भारत अपने आंतरिक मामलों में दखल मानता है तो पाकिस्तान को ऐसा करने का हक कहां से मिला है! इसमें दो राय नहीं कि ऐसा करके पाकिस्तान भारत की संप्रभुता में दखल देने जैसा काम कर रहा है। लेकिन क्या उसे यह उम्मीद है कि भारत को इसकी अनदेखी करनी चाहिए?

दुनिया का शायद ही कोई ऐसा आजाद और संप्रभु देश होगा जो अपनी एकता को नुकसान पहुंचाने की कोशिशों के प्रति आंखें मूंदे रखेगा। इसलिए अगर भारत ने इसे अपनी संप्रभुता में दखल और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करने के ‘शर्मनाक प्रयास’ के रूप में देखा तो यह स्वाभाविक है। इसी सिलसिले में भारत ने बुधवार को पाकिस्तान के उच्चायुक्त सोहेल महमूद को तलब किया और इस मसले पर अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। सच तो यह है कि इस तरह की हरकत खुद पाकिस्तान के अपने पैमानों के मुताबिक भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सभी नियमों का उल्लंघन है। इसलिए अगर कुरैशी की मीरवाइज से बातचीत को भारत के आंतरिक मामलों में सीधे दखल की तरह देखा जा रहा है तो यह स्वाभाविक है। बल्कि ऐसा करके पाकिस्तान ने एक बार फिर यही दर्शाया है कि वह आतंकियों और भारत के खिलाफ होने वाली गतिविधियों को अंजाम देने वाले तत्त्वों को शह देता है। जबकि पाकिस्तान को यह याद रखना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और उसे इस राज्य से संबंधित किसी भी मामले में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

हालांकि भारत की आपत्तियों को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने खारिज कर दिया है और कहा है कि उसकी कश्मीरी नेताओं से इस तरह की बातचीत हमेशा होती रही है और इसमें कुछ भी नया नहीं है। लेकिन क्या वह अपने सीमा-क्षेत्र में किसी अन्य देश के शीर्ष नेताओं के स्तर से ठीक इसी तरह की गतिविधि को लेकर ऐसे ही खयाल रख सकता है? यह छिपा नहीं है कि अपने सीमा-क्षेत्र में होने वाली आतंकी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान अक्सर भारत पर आरोप लगाता रहा है। जबकि लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के पाकिस्तानी ठिकाने से अपनी गतिविधियां संचालित करने की खबरें अब नई नहीं हैं। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में कई बार पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा किया जा चुका है। इसके अलावा, एक ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भारत के साथ बातचीत की पेशकश करते हैं, दूसरी ओर उनकी सरकार में एक वरिष्ठ मंत्री वहां के आतंकी सरगना हाफिज सईद के साथ मंच साझा करते दिखाई देते हैं तो एक अन्य मंत्री भारत में अलगाववादी तत्त्वों से बातचीत करते हैं। इस तरह के दोहरे रवैये के साथ पाकिस्तान किस बुनियाद पर भारत के साथ दोस्ती या फिर सकारात्मक रुख की उम्मीद करता है?

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