करीब डेढ़ महीने बाद बहुत मुश्किल से पहले युद्धविराम और फिर शांति की राह तैयार करने के मकसद से ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता की गुंजाइश बनी थी। अतीत से लेकर वर्तमान तक दोनों देशों के बीच जैसे संबंध रहे हैं, उसमें अचानक ही सब कुछ पटरी पर आ जाने की बहुत ज्यादा उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन कम से कम युद्ध रुकने और दीर्घकालिक हल निकालने के लिए संवाद कायम रखने की गुंजाइश जरूर बनी थी।
अफसोस की बात यह है कि पाकिस्तान के इस्लामाबाद में वार्ता के विफल होने के बाद बातचीत के जरिए शांति की संभावना तैयार करने के बजाय एक ओर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से टकराव की भाषा का सहारा लेना शुरू कर दिया है, तो दूसरी ओर ईरान ने भी अपने ऊपर होने वाले हमलों का जवाब देने की बात कही है।
इस बीच युद्धविराम लागू होने के बावजूद इजरायल ने लेबनान पर अपने हमले जारी रखे। ऐसी स्थिति में यह समझना मुश्किल नहीं है कि शांति प्रयासों के लिए होने वाली कवायदों और स्थायी हल निकालने की कोशिशों के सामने कैसी चुनौती खड़ी हो सकती है।
गौरतलब है कि ईरान के साथ वार्ता के विफल होने के बाद ट्रंप ने बेहद तल्ख जुबान में कहा कि ईरान होर्मुज जलमार्ग को खोल दे, नहीं तो अमेरिका समूचे इलाके की नाकेबंदी कर देगा। इसके जवाब में ईरान की ओर से कहा गया कि फारस की खाड़ी और ओमान सागर में सुरक्षा या तो सभी के लिए होगी या किसी के लिए भी नहीं।
ईरान का कहना है कि अगर उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई, तो इस क्षेत्र का कोई भी बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा। सवाल है कि अगर दोनों ही अपनी धमकियों पर अड़े रहते हैं, तो इसका हासिल क्या होगा। युद्ध को खत्म करने के लिए जहां नए रास्तों की तलाश की जानी चाहिए थी, वहीं पहली बैठक में मिली नाकामी के बाद दोनों ओर से हमलावर रुख का प्रदर्शन किया जा रहा है।
दोनों पक्षों की भाषा में नरमी नहीं आई
एक आशंका यह भी पैदा हो रही है कि एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने को लेकर अगर दोनों पक्षों की भाषा में नरमी नहीं आई, तो इसका असर युद्धविराम पर भी पड़ सकता है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि अगर होर्मुज जलमार्ग की नाकेबंदी को लेकर अमेरिका की धमकी वास्तव में अमल में आती है, तो आने वाले दिनों में वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट की वजह से हालात कैसे हो सकते हैं।
ईरान ने होर्मुज जलमार्ग को बाधित किया हुआ है, लेकिन उसने कुछ देशों को वहां से गुजरने की इजाजत दी हुई है। कुछ अन्य देशों को भी छूट देने की बात चल रही थी। अब जहां कोशिश इस बात की होनी चाहिए थी कि होर्मुज जलमार्ग को खोलने सहित अन्य मुद्दों पर टकराव को खत्म करके स्थायी शांति का रास्ता तैयार किया जाए, वहां नए सिरे से टकराव का रास्ता अख्तियार किया जा रहा है।
अमेरिका की ओर से युद्ध में अपना पलड़ा भारी करने की जिद की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है, जिसका खमियाजा वैसे देश ज्यादा उठाएंगे, जो तेल और गैस के लिए फिलहाल काफी हद तक खाड़ी देशों पर निर्भर हैं। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि दुनिया भर के देशों में तेल और गैस का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलमार्ग से होकर ही गुजरता है। इसके पूरी तरह बंद होने के बाद भारत सहित दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में संकट गहरा सकता है। इसके अलावा, अगर रूस और चीन भी इस संकट की जद में आते हैं, तो एक नई जटिलता खड़ी होगी।
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होर्मुज बंद होने से बड़ा नुकसान केवल ईरान को नहीं बल्कि चीन को भी हो सकता है। इसकी वजह यह है कि दुनिया में चीन ऐसा देश है, जो कि ईरान का 80 प्रतिशत तेल खरीदता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
