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संपादकीय: नागरिकता का सवाल

आम चुनावों के मद्देनजर केंद्रीय गृहमंत्रालय ने मांग की थी कि चूंकि चुनाव के दौरान केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल व्यस्त रहेगा, इसलिए एनआरसी का काम दो हफ्ते के लिए टाल दिया जाए। पर सर्वोच्च न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी की कि केंद्र सरकार इस काम को बर्बाद करना चाहती है।

Author February 7, 2019 4:27 AM
प्रतीकात्मक फोटो (Source: PTI)

असम में राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण यानी एनआरसी के काम को रोकने संबंधी केंद्र सरकार की अपील को सर्वोच्च न्यायालय ने ठुकरा दिया है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी हाल में एनआरसी की तिथि जुलाई से आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। आम चुनावों के मद्देनजर केंद्रीय गृहमंत्रालय ने मांग की थी कि चूंकि चुनाव के दौरान केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल व्यस्त रहेगा, इसलिए एनआरसी का काम दो हफ्ते के लिए टाल दिया जाए। पर सर्वोच्च न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी की कि केंद्र सरकार इस काम को बर्बाद करना चाहती है। दरअसल, एनआरसी को लेकर असम में शुरू से ही विवाद चल रहा है। सरकार का मानना है कि असम में बड़ी तादाद में विदेशी घुसपैठिए आकर बस चुके हैं। उनकी पहचान करना जरूरी है। घुसपैठ कर आए लोगों के जरिए आतंकवादी संगठन देश की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देते हैं। इसलिए पिछली जुलाई में असम में राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके तहत जो पहली सूची आई, उसमें करीब चालीस लाख लोगों के नाम नहीं थे। उनमें से साढ़े सैंतीस लाख लोगों के नाम पूरी तरह खारिज किए जा चुके हैं, जबकि ढाई लाख लोगों के नाम विचाराधीन सूची में हैं। इसे लेकर वहां लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

असल में एनआरसी के लिए जो पहली सूची जारी की गई थी, उसमें उन लोगों के नाम छांट दिए गए थे, जिनके पास उचित नागरिकता प्रमाण-पत्र नहीं थे। मगर बहुत सारे लोगों का कहना है कि वे अपनी नागरिकता संबंधी प्रमाण-पत्र बनवाने को लेकर सजग नहीं थे, जबकि वे पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं। फिर सरकार के पास खुद ऐसा कोई पुख्ता आंकड़ा नहीं है, जिससे बाहर से आकर बसे लोगों की वास्तविक संख्या का पता चलता हो। अलग-अलग बयानों में वहां की सरकार विरोधाभासी आंकड़े बता चुकी है। दरअसल, यह इसलिए हुआ कि सरकार ने पहले बाहर से आए लोगों के बारे में जानकारी नहीं जुटाई, उसने सीधा पंजीकरण का काम शुरू कर दिया। ऐसे में बहुत सारे ऐसे लोगों के नाम सूची से बाहर हो गए, जिनके पास किसी वजह से कोई प्रमाण-पत्र नहीं था। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग आमतौर पर जन्म और मृत्यु प्रमाण-पत्र जैसे कागजात रखने, अपनी पहचान संबंधी दस्तावेज संजोने के मामले में लापरवाह देखे जाते हैं। कुछ गड़बड़ियां ग्रामीण प्रशासन के स्तर पर भी होती हैं, जिसके चलते बहुत सारे लोगों के पास उनकी नागरिकता प्रमाणित करने वाले कागजात नहीं होते। इसलिए राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण में ऐसे लोगों की पहचान संदिग्ध हो गई है।

ऐसे में जहां इतनी बड़ी संख्या में लोगों के अपनी जगह-जमीन से उजड़ने और किसी पराए देश में जाकर शरण पाने की यातना झेलने का संकट हो, उस काम में देरी करना उचित नहीं जान पड़ता। इस काम को जितनी जल्दी और जितनी पारदर्शिता से हो सके, निपटाने की कोशिश होनी चाहिए। यह सही है कि चुनावों में सशस्त्र बलों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, उनकी संख्या भी सीमित है, इसलिए दो कामों में उनकी तैनाती परेशानी पैदा कर सकती है। पर चुनाव के नाम पर नागरिकता की पहचान को टालना ठीक नहीं है। चुनाव प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए दूसरे सुरक्षा बलों की भी मदद ली जा सकती है, बाहर से सेना की टुकड़ियां बुलाई जा सकती हैं। ऐसा अनेक बार होता भी है। इसलिए एनआरसी के काम को रोकने पर सर्वोच्च न्यायालय की आपत्ति उचित कही जा सकती है।

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