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संपादकीय: हिंसा की सियासत

अगर अखिलेश यादव को विश्वविद्यालय के किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था, तो इस तरह उनके पार्टी कार्यकर्ताओं का हुजूम वहां क्यों जमा हुआ था। वे अकेले जाते, अपनी बात कहते और लौट आते।

Author February 14, 2019 5:38 AM
अखिलेश यादव। (Source: PTI)

राजनीतिक दलों को अब शायद लोकतांत्रिक तौर-तरीकों पर विश्वास नहीं रह गया है। मामूली बातों पर भी वे हंगामा खड़ा करने और अपने कार्यकर्ताओं को असहज स्थिति पैदा करने के लिए उकसाने से परहेज नहीं करते। प्रयागराज में भी यही हुआ, जब समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में हिस्सा लेने से रोक दिया गया। सपा कार्यकर्ताओं ने देश भर में विरोध प्रदर्शन किया और कई जगह पुलिस के साथ उनकी हिंसक झड़पें भी हुर्इं। कई जगह बसपा कार्यकर्ताओं ने भी उनका साथ दिया। अब उनका आरोप है कि केंद्र सरकार के इशारे पर उन्हें कार्यक्रम में हिस्सा लेने से रोका गया। जबकि हकीकत यह है कि अखिलेश यादव को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उनका कार्यक्रम रद्द करने संबंधी सूचना पहले ही दे दी गई थी। विश्वविद्यालय प्रशासन और उत्तर प्रदेश पुलिस को आशंका थी कि उनके आने से विश्वविद्यालय के छात्रों में उत्तेजना फैल और उनमें टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। इस समय प्रयागराज में कुंभ चल रहा है और सुरक्षा कारणों से प्रशासन ऐसी किसी भी स्थिति को टालना चाहता था। मगर अखिलेश यादव ने उस आदेश को नहीं माना और प्रयागराज के लिए हवाई जहाज लेने लखनऊ हवाई अड्डे पर पहुंच गए। वहां प्रशासन ने उन्हें रोका।

लोकतंत्र में अपनी बात कहने, सभा-संगोष्ठी करने का हर किसी को अधिकार है, पर जब किसी की सभा-संगोष्ठी से समाज के किसी हिस्से में वैमनस्यता या उत्तेजना फैलने की आशंका हो, तो प्रशासन का दायित्व बनता है कि वह उसे रोके। उत्तर प्रदेश सरकार का यह तर्क गलत नहीं कहा जा सकता कि कुछ दिनों पहले जब अखिलेश यादव प्रयागराज गए थे और कुंभ में स्नान किया था, तब उन्हें नहीं रोका गया था। इस बार उनकी पार्टी के लोगों की मंशा संदेहास्पद थी। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रयागराज में प्रदेश के विभिन्न जिलों से कार्यकर्ता पहुंचे थे और अखिलेश यादव को रोके जाने की सूचना मिलते ही वे आंदोलन पर उतर आए थे। अगर अखिलेश यादव को विश्वविद्यालय के किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था, तो इस तरह उनके पार्टी कार्यकर्ताओं का हुजूम वहां क्यों जमा हुआ था। वे अकेले जाते, अपनी बात कहते और लौट आते। कुछ महीने पहले ही इलाहाबाद छात्र संगठन का चुनाव हुआ था, जिसमें नतीजों के बाद छात्र गुटों में हिंसक झड़पें हुई थीं। यहां तक कि एक छात्रावास के कमरों में आग लगा दी गई थी। उससे सपा के समर्थक छात्र आक्रोश में हैं। इसलिए अगर प्रशासन को किसी तरह की कानून-व्यवस्था संबंधी गड़बड़ी की आशंका हुई, तो वह निर्मूल नहीं कही जा सकती।

दरअसल, आम चुनाव नजदीक हैं, इसलिए विपक्षी दल हर मामले को सत्ता पक्ष के विरोध में पेश करने का मौका तलाशते हैं। अखिलेश यादव के रोके जाने की घटना को भी इसी मंशा से उभारा गया। विश्वविद्यालय पठन-पाठन के केंद्र होते हैं, राजनीति के अखाड़े नहीं। ऐसा नहीं कि विश्वविद्यालयों में राजनेताओं का प्रवेश नहीं होना चाहिए, पर उन्हें विश्वविद्यालयों की गरिमा और उनकी मर्यादा को ध्यान में रखते हुए ही वहां जाना चाहिए। अगर अखिलेश यादव को आमंत्रित करने वाले छात्र संगठन और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इस मर्यादा का पालन करना जरूरी नहीं समझा, तो विश्वविद्यालय प्रशासन को वह कार्यक्रम रद्द करने का पूरा अधिकार था। इस पर अखिलेश यादव और उनकी पार्टी को क्यों एतराज होना चाहिए।

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