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आतंक के खिलाफ

भारत ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर वैश्विक सम्मेलन बुलाने के लिए एक दस्तावेज संयुक्त राष्ट्र में 1986 में पेश किया था। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि सदस्य राष्ट्रों के बीच आतंकवाद की परिभाषा को लेकर एक राय नहीं बन पाई और यह प्रस्ताव लागू नहीं हो पाया।

प्रतीकात्मक फोटो ( फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस )

जैश ए मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर के वैश्विक आतंकी घोषित होने के बाद भारत ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अगला कदम बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र से आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक सम्मेलन बुलाने को कहा है। भारत की यह मांग प्रासंगिक है और सम्मेलन की जरूरत को रेखांकित करती है। इस वक्त दुनिया के ज्यादातर देश किसी न किसी रूप में आतंकवाद के शिकार हैं और इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं। रोजाना बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं, बेघर हो रहे हैं, अरबों-खरबों की संपत्ति का नुकसान हो रहा है, शरणार्थी के रूप में दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं। आतंकवाद अब कितना भयावह रूप ले चुका है, यह किसी से छिपा नहीं है। पश्चिम एशिया तो लगता है आतंकवाद का केंद्र ही बन गया है। लेकिन दुख की बात है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था आतंकवाद के मुद्दे पर ऐसा कुछ नहीं कर पा रही है जिससे इस समस्या से निपटने के लिए ठोस और सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके और पीड़ित देश मिल कर मुकाबले की रणनीति बना सकें। इसकी बड़ी वजह यह है कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में ही खेमेबाजी है और खासतौर से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य भी ऐसी समस्या से निपटने के लिए एकजुट नहीं हो पाते। वे अपने हितों में उलझे पड़े हैं।

दो महीने पहले न्यूजीलैंड और पिछले महीने श्रीलंका में हुए हमले बता रहे हैं कि आतंकवाद ने किसी देश को नहीं छोड़ा है। न्यूजीलैंड की मस्जिदों पर हमले स्तब्ध कर देने वाले थे। श्रीलंका में बौद्ध व मुसलिम समुदाय में टकराव होते रहे हैं, लेकिन ये संघर्ष वैसी गंभीर चुनौती नहीं बने थे जैसे पिछले महीने ईस्टर के मौके पर गिरजाघरों को निशाना बनाया गया। यह साफ हो चुका है कि श्रीलंका में इस आतंकी हमले के पीछे इसलामिक स्टेट (आइएस) का हाथ था और इसे न्यूजीलैंड के हमले का बदला बताया जा रहा था। हाल में अमेरिका के कुछ शहरों में यहूदी धर्म स्थलों पर हमले हुए, पहले भी होते रहे हैं। अमेरिका अलकायदा का सबसे बड़ा आतंकी हमला झेल चुका है। यूरोप का शायद ही कोई देश बचा हो जहां आतंकी हमले न हुए हों। ऐसे में क्यों नहीं आतंकवाद पीड़ित देशों को मिल-बैठ कर रणनीति बनाने पर विचार करना चाहिए!

भारत ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर वैश्विक सम्मेलन बुलाने के लिए एक दस्तावेज संयुक्त राष्ट्र में 1986 में पेश किया था। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि सदस्य राष्ट्रों के बीच आतंकवाद की परिभाषा को लेकर एक राय नहीं बन पाई और यह प्रस्ताव लागू नहीं हो पाया। आठवें दशक में भारत ने पंजाब में आतंकवाद की पीड़ा झेली थी। पंजाब में आतंकवाद अलग खालिस्तान की मांग को लेकर शुरू हुआ था, और इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ था। इसके बाद कश्मीर में आतंकवाद का दौर शुरू हुआ जो आज तक कायम है। लेकिन तब दुनिया के देश भारत के साथ इसलिए नहीं आ रहे थे क्योंकि वे खुद आतंकवाद से त्रस्त नहीं थे। हकीकत यह है कि आतंकवाद से निपटने के लिए दुनिया के असहाय देश जिन बड़े अधिकार-संपन्न देशों की ओर देखते हैं और उनसे उम्मीदें लगाते हैं वही दुनिया में आतंकवाद पनपाने के लिए जिम्मेदार भी हैं। पाकिस्तान दुनिया में आतंकियों का सबसे बड़ा ठिकाना है, यह जानते हुए भी अमेरिका और चीन उसके हमदर्द हैं। दरअसल वैश्विक राजनीति में आतंकवाद को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना कुछ देशों की रणनीति का हिस्सा ही है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र कर भी क्या सकता है!

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