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संपादकीय: खबर और खतरे

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने तो अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि अफगानिस्तान में पत्रकारों को खतरा आतंकी संगठनों के अलावा सरकार, राजनीतिकों और फौजियों से भी है। पत्रकार जानलेवा हमले के डर से भ्रष्टाचार और जमीनों पर कब्जे से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग से बचने लगे हैं।

Author May 2, 2018 4:07 AM
काबुल में जो मीडियाकर्मी आत्मघाती हमले के शिकार हुए, वे कुछ ही समय पहले हुए विस्फोट के कवरेज के लिए मौके पर पहुंचे थे। तभी दूसरा हमला हुआ और सब मारे गए। (फोटोः एएनआई)

अफगानिस्तान में पत्रकारों के लिए काम करना कितना जोखिम-भरा और असुरक्षित हो गया है, इसका अंदाजा काबुल में सोमवार को हुए आत्मघाती हमले में नौ पत्रकारों की मौत से लगाया जा सकता है। चाहे तालिबान हों या फिर दूसरे आतंकी संगठन, अफगानिस्तान में मीडियाकर्मी शुरू से इनके निशाने पर रहे हैं। पिछले एक दशक में पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। सत्रह साल पहले हुए तालिबानी सत्ता के पतन के बाद यह पहला मौका है जब अफगानिस्तान में मीडियाकर्मियों पर इतना बड़ा आत्मघाती हमला हुआ। इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली है। काबुल में जो मीडियाकर्मी मारे गए हैं उनमें विदेशी मीडिया संस्थानों के लिए काम करने वाले भी शामिल थे। इनमें एएफपी के मुख्य फोटोग्राफर, रेडियो फ्री यूरोप और अफगान प्रसारक टोलो न्यूज और 1-टीवी के पत्रकार शामिल हैं। पाकिस्तान सीमा से सटे खोस्त प्रांत में भी एक बीबीसी संवाददाता को मार दिया गया। काबुल में जिस तरह से ये आत्मघाती हमले हुए हैं उससे साफ है कि इस बार मीडियाकर्मी ही निशाने पर थे। हमलावर पत्रकार बन कर ही मीडियाकर्मियों के बीच पहुंचा और खुद को उड़ा लिया।

काबुल का हमला बताता है कि अफगानिस्तान और दुनिया के ऐसे ही अन्य अशांत और युद्ध की मार झेल रहे इलाकों में मीडियाकर्मी किस तरह जान जोखिम में डाल कर काम कर रहे हैं। काबुल में जो मीडियाकर्मी आत्मघाती हमले के शिकार हुए, वे कुछ ही समय पहले हुए विस्फोट के कवरेज के लिए मौके पर पहुंचे थे। तभी दूसरा हमला हुआ और सब मारे गए। इससे पहले 2016 में अफगानिस्तान में चौंतीस पत्रकार मारे गए थे। उस साल तालिबान ने एक आत्मघाती हमले में टोलो टीवी चैनल के सात मीडियाकर्मियों को मार डाला था। 2014 में अलग-अलग हमलों में आठ पत्रकार मारे गए थे। एक सौ अस्सी देशों वाले प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में अफगानिस्तान एक सौ अठारहवें स्थान पर है। साल 2017 में वहां बीस मीडियाकर्मी मारे गए। अफगान पत्रकार सुरक्षा समिति (एजेएससी) की मानें तो पिछला साल मीडियाकर्मियों के लिए बहुत ही खराब रहा। पत्रकारों पर हमलों में सड़सठ फीसद की वृद्धि हुई है। पिछले साल मीडियाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और धमकी के एक सौ उनहत्तर मामले दर्ज किए।

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने तो अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि अफगानिस्तान में पत्रकारों को खतरा आतंकी संगठनों के अलावा सरकार, राजनीतिकों और फौजियों से भी है। पत्रकार जानलेवा हमले के डर से भ्रष्टाचार और जमीनों पर कब्जे से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग से बचने लगे हैं। तालिबान से उन पत्रकारों को खतरा है जो उनका गुणगान नहीं करते। महिला पत्रकारों को भी हिंसा और जान से मारने की धमकियां मिलती रहती हैं। अफगानिस्तान में भले निर्वाचित सरकार हो, लेकिन तस्वीर कुछ और ही हालात बयां करती है। पूरा मुल्क नाटो और अमेरिकी फौज के चंगुल में है। पिछले एक साल में अफगान सुरक्षा बलों की संख्या में भी कमी आई है। दूसरी ओर तालिबान और आइएस के आतंकियों ने अफगान सुरक्षा बलों के खिलाफ लड़ाई तेज कर दी है। हालत यह है कि पिछले तीन साल में तालिबान और अन्य आतंकी संगठनों ने कई इलाकों पर कब्जा कर लिया है और अफगान सरकार का नियंत्रण कमजोर पड़ा है। ऐसे में वहां मीडियाकर्मी कैसे निडरता और निष्पक्षता के साथ अपना काम कर पाएंगे!

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