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मन और मंशा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘मन की बात’ संबोधन-शृंखला में इस बार किसानों से रूबरू हुए। रविवार को आकाशवाणी से प्रसारित अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर विपक्ष भ्रम फैला रहा है; किसान विपक्ष के बहकावे में न आएं। इसी के साथ उन्होंने 2013 में बने कानून में संशोधन के फायदे गिनाते […]

Author March 24, 2015 8:57 AM

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘मन की बात’ संबोधन-शृंखला में इस बार किसानों से रूबरू हुए। रविवार को आकाशवाणी से प्रसारित अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर विपक्ष भ्रम फैला रहा है; किसान विपक्ष के बहकावे में न आएं। इसी के साथ उन्होंने 2013 में बने कानून में संशोधन के फायदे गिनाते हुए दावा किया कि इस कानून में प्रस्तावित फेरबदल कॉरपोरेट जगत को नहीं बल्कि किसानों के हितों को ध्यान में रख कर किया गया है। अच्छी बात है कि जिस मसले पर देश भर में बहस चल रही है उस पर प्रधानमंत्री ने विस्तार से अपना पक्ष रखा है। मगर सबसे अहम मुद््दों पर मोदी ने चुप्पी साध ली है। उन्होंने कहा कि 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून हड़बड़ी में बना था। जबकि सच यह है कि इस पर देश में दो साल तक चर्चा चली थी, जिसमें राजनीतिक दलों के अलावा तमाम सामाजिक संगठनों, किसानों और आदिवासियों के प्रतिनिधियों ने भी अपनी राय दी। स्थायी संसदीय समिति ने एक साल तक विधेयक के स्वरूप पर विचार कर अपनी सिफारिशें दी थीं। उस समिति की अध्यक्ष भाजपा की सुमित्रा महाजन थीं, जो अब लोकसभा अध्यक्ष हैं। भाजपा ने भी विधेयक का समर्थन किया था।

विडंबना यह है कि हड़बड़ी का आरोप मोदी लगा रहे हैं, जिन्होंने संसदीय सत्र का इंतजार करना भी जरूरी नहीं समझा और अध्यादेश जारी कर दिया। उन्होंने जो नया विधेयक पेश किया है उससे कॉरपोरेट जगत गदगद है और किसान बुरी तरह चिंतित हैं। फिर भी मोदी का दावा है कि उनका विधेयक कॉरपोरेट के नहीं, किसानों के पक्ष में है। अगर यही बात है, तो किसान नाराज क्यों हैं? क्या यह विपक्ष के बहकावे का ही नतीजा है? जाहिर है, कुछ ऐसी सच्चाई जरूर है जिसे मोदी स्वीकार करना नहीं चाहते। 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने की मांग किसानों की तरफ से नहीं उठी थी। यह मांग कंपनियों की तरफ से आ रही थी। अपने संबोधन में मोदी ने कहा कि निजी क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहीत करते समय किसानों की सहमति ली जाएगी। पर पीपीपी मॉडल की परियोजनाओं की बाबत उन्होंने कुछ नहीं कहा, जबकि अधिग्रहण के लिए इसी तरीके का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल होना है।

इसी तरह परियोजनाओं के सामाजिक प्रभाव आकलन का प्रावधान हटाए जाने पर भी वे खामोश रहे, जो कि विवाद एक और प्रमुख विषय है। उन्होंने अधिग्रहण से किसान परिवारों को नौकरी मिलने का भरोसा दिलाया है। अपनी हर चुनावी रैली में वे बड़ी संख्या में नौकरियां मिलने का जो वादा दोहराते थे उसे पूरा करने की दिशा में दस महीनों में उनकी सरकार ने क्या किया है? किसानों से उन्होंने वादा किया था, जो भाजपा के घोषणापत्र में भी है, कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में पचास फीसद की बढ़ोतरी की जाएगी। लेकिन उनकी सरकार बनने के बाद चावल और गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में पचास-पचास रुपए प्रति क्विंटल की नाममात्र की बढ़ोतरी हुई है।

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि उसे सत्ता में आने का मौका मिला तो स्वामीमाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसानों को उनकी उपज की लागत से डेढ़ गुना मूल्य मिले। लेकिन अब इस वादे को भाजपा ताक पर रख चुकी है। यही नहीं, केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने राज्यों को निर्देश भेजा कि किसानों को अतिरिक्त बोनस न दिया जाए। हाल में बेसौसम की बारिश से फसलों को बड़े पैमाने पर हुए नुकसान को देखते हुए किसान मुआवजे की मांग कर रहे हैं, पर प्रधानमंत्री इस मामले में भी मौन हैं। जबकि उनकी सरकार ने इस बार के बजट में कॉरपोरेट जगत को 5.90 लाख करोड़ रुपए कर-रियायत मंजूर की है। फिर भी प्रधानमंत्री किसानों के हमदर्द दिखना चाहते हैं!

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