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गंगा का निर्मलीकरण लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का एक अहम वादा था। वाराणसी से सांसद चुने गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे प्राथमिकता भी दी। उन्होंने इसके लिए उमा..

Author नई दिल्ली | November 2, 2015 21:51 pm
गंगा घाट का एक नजारा (चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।)

गंगा का निर्मलीकरण लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का एक अहम वादा था। वाराणसी से सांसद चुने गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे प्राथमिकता भी दी। उन्होंने इसके लिए उमा भारती की अगुआई में एक अलग विभाग बना दिया। पर पिछले डेढ़ साल में इस विभाग की कोई खास उपलब्धि सामने नहीं आई है। लिहाजा, एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने गंगा की सफाई को लेकर पिछले महीने दो बार नाराजगी जताई। उसने केंद्र और राज्य सरकारों से पूछा कि कोई भी ऐसी जगह बता दें, जहां गंगा की हालत में सुधार आया हो। आखिर प्रधानमंत्री के संकल्प और बढ़े हुए आबंटन के बावजूद कुछ ऐसा क्यों नहीं हो सका, जो एनजीटी को संतुष्ट कर सके? देर से ही सही, अब केंद्र ने गंगा सफाई को कहीं अधिक गंभीरता से लेने का इरादा जताया है। जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के मुताबिक प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना अगले साल जनवरी से शुरू होगी और इसे तीन चरणों में पूरा किया जाएगा।

परियोजना का पहला चरण एक साल में पूरा करने का लक्ष्य है, जिसकी शुरुआत उत्तराखंड से होगी। गंगा को प्रदूषण-मुक्त करने की बात तीन दशक से होती रही है। इस दौरान कई योजनाएं बनीं, पर उनका नतीजा सिफर रहा है। तीस साल में हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए, पर गंगा में प्रदूषण तनिक कम नहीं हो सका। इस नाकामी के अनेक कारण गिनाए जा सकते हैं। एक प्रमुख वजह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल की कमी रही है। इससे सबक लेते हुए केंद्र ने सारा बोझ अपने सिर लेने का फैसला किया है। नमामि गंगे परियोजना पर केंद्र और राज्यों के बीच खर्च का बंटवारा पचहत्तर और पच्चीस के अनुपात में होना था, लेकिन अब सारा खर्च केंद्र उठाएगा।

आबंटन को लेकर कोई उलझन न रहने से उम्मीद की जा सकती है कि अब परियोजना के क्रियान्वयन में तेजी आएगी। गंगा के निर्मलीकरण की चुनौती मुख्य रूप से दो मोर्चों पर रही है। एक यह कि गंगा में गिरने वाली सीवेज की गंदगी को रोकना। दूसरा, गंगा को औद्योगिक कचरे से बचाना। सीवेज की गंदगी से गंगा को बचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और खासकर नगर निगमों की रही है। पर उनकी काहिली को देखते हुए केंद्र ने अब इस जिम्म्मेवारी को कॉरपोरेट हाथों में सौंपने के संकेत दिए हैं।

हाल में तैयार हुई विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट के मुताबिक गंगा के किनारे स्थित एक सौ अठारह शहरों से रोजाना 363.6 करोड़ लीटर अपशिष्ट और सात सौ चौंसठ उद्योगों के प्रदूषक तत्त्व गंगा में मिल जाते हैं। इसे रोकने के प्रयास नाकाम रहे हैं। अब सरकार ने इस बारे में एक ऐसी तजवीज सोची है जो निगरानी की तकनीक से लैस होगी। अगर किसी उद्योग से नदी जल में पांच मिनट से ज्यादा प्रदूषण हुआ, तो एसएमएस आ जाएगा, अगर प्रदूषण पंद्रह मिनट से ज्यादा हुआ तो कानूनी कार्रवाई शुरू हो जाएगी। गंगा की सफाई को लेकर अब तक बातें इतनी अधिक हुई हैं और नतीजा इतना निराशाजनक रहा है कि यह भरोसा दिला पाना आसान नहीं है कि नई योजना का हश्र पिछली योजनाओं जैसा नहीं होगा। मगर उम्मीद के भी दो विशेष कारण हैं। एक यह कि मोदी जानते हैं कि गंगा सफाई के मोर्चे पर नाकामी उन्हें राजनीतिक रूप से महंगी पड़ेगी। दूसरे, सरकार को उसकी जवाबदेही की याद दिलाने में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण भी तत्पर है।

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