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बेजा दखल

नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के तौर पर दूसरे कार्यकाल के लिए अमर्त्य सेन का अपनी उम्मीदवारी वापस लेना कई सवाल खड़े करता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सेन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचक रहे हैं। दो खास कारणों से। एक तो यह कि मोदी के विकास-मॉडल से वे इत्तिफाक नहीं रखते। दूसरे, […]

Author February 23, 2015 11:43 AM

नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के तौर पर दूसरे कार्यकाल के लिए अमर्त्य सेन का अपनी उम्मीदवारी वापस लेना कई सवाल खड़े करता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सेन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचक रहे हैं। दो खास कारणों से। एक तो यह कि मोदी के विकास-मॉडल से वे इत्तिफाक नहीं रखते। दूसरे, अल्पसंख्यकों के प्रति मोदी सरकार और भाजपा का रवैया उन्हें चिंतित किए रहता है। लेकिन उनका अर्थशास्त्रीय चिंतन और राजनीतिक रुझान नालंदा विश्वविद्यालय के उनके कुलाधिपति बने रहने की राह में क्यों आड़े आना चाहिए था? यों सरकार ने इस पद पर उनके बने रहने का जाहिरा तौर पर कोई विरोध नहीं किया है। मगर उसकी अनिच्छा छिपी नहीं रह सकी है। विश्वविद्यालय के संचालक मंडल ने एक महीने पहले ही सर्वसम्मति से उनके नाम की संस्तुति विजिटर यानी राष्ट्रपति के पास भेज दी थी।

मगर राष्ट्रपति इस पर कोई निर्णय नहीं कर सके, क्योंकि विदेश मंत्रालय ने उनके पास अपनी सहमति नहीं भेजी। मंजूरी का अभाव दखल देने के समान ही है। इससे खिन्न होकर अमर्त्य सेन ने संचालक मंडल को लिखे एक पत्र में अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की बात कही है। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा है कि मोदी सरकार नहीं चाहती कि वे कुलाधिपति के पद पर बने रहें। उनके इस आरोप पर हंगामा मचने के कारण सरकार बचाव की मुद्रा में आ गई। आनन फानन में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बयान जारी किया कि विश्वविद्यालय के संचालक मंडल की बैठक का कार्यवाही-विवरण नहीं मिला है। जबकि सेन का दावा है कि कार्यवाही-विवरण भेज दिया गया था, सभी ने इसकी पुष्टि की थी। सेन ने संचालक मंडल को लिखे अपने पत्र में यह साफ कहा है कि यह मुद्दा शैक्षणिक मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप का है। इस तरह के बेजा दखल के उन्होंने कई और उदाहरण भी दिए हैं।

पिछली सरकार के समय नालंदा विश्वविद्यालय की शुरुआत एक महत्त्वाकांक्षी शैक्षिक परियोजना के रूप में की गई। अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग खासकर पूर्वी एशिया के विशेषज्ञों को इसमें जोड़ने के खास प्रयास किए गए। इसके संचालक मंडल में जापान, चीन, सिंगापुर, थाईलैंड आदि देशों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। संचालक मंडल ने अर्थशास्त्र के नोबेल सम्मान से विभूषित अमर्त्य सेन को कुलाधिपति बनाए रखने का आम राय से निर्णय किया,तो यह विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के सर्वथा उपयुक्त था। एक तरफ तो विदेश मंत्रालय का कहना है कि संचालक मंडल का कार्यवाही-विवरण मिला ही नहीं। दूसरी तरफ मंत्रालय यह भी कहता है कि विवरण में दो विकल्प दिए गए थे। या तो सेन को पद पर बरकरार रखा जाए, या उनका उत्तराधिकारी नियुक्त करने के लिए विजिटर यानी राष्ट्रपति विश्वविद्यालय के संचालक मंडल से तीन नाम मांगें। यह स्पष्टीकरण लीपापोती के अलावा कुछ नहीं है। मंत्रालय इस बात का कोई संतोषजनक जवाब क्यों नहीं देता कि संचालक मंडल की सिफारिश पर सरकार कुंडली मार कर क्यों बैठी रही? अमर्त्य सेन को जब भारत रत्न दिया गया, तब भी वे भाजपा की राजनीति के आलोचक थे और उस समय केंद्र में भाजपा की ही सरकार थी। भारत रत्न देने का निर्णय प्रधानमंत्री की मंजूरी से होता है। लेकिन तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अमर्त्य सेन की उपलब्धियों में भारत का गौरव देखा और सेन को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से विभूषित करना उपयुक्त समझा। लेकिन मोदी सरकार का रवैया अलग और बेहद चिंताजनक है।

 

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