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नाहक नाराजगी

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की ताजा टिप्पणी पर नाराजगी जताने के बजाय मोदी सरकार को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। बीते गुरुवार को वाशिंगटन में एक समारोह को संबोधित करते हुए ओबामा ने कहा कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में पनपी धार्मिक असहिष्णुता देख कर गांधीजी स्तब्ध रह गए होते। इस पर वित्तमंत्री […]
Author February 9, 2015 16:32 pm
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अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की ताजा टिप्पणी पर नाराजगी जताने के बजाय मोदी सरकार को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। बीते गुरुवार को वाशिंगटन में एक समारोह को संबोधित करते हुए ओबामा ने कहा कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में पनपी धार्मिक असहिष्णुता देख कर गांधीजी स्तब्ध रह गए होते। इस पर वित्तमंत्री अरुण जेटली का कहना है कि भारत का इतिहास धार्मिक सहिष्णुता का रहा है और ऐसी घटनाएं उसका इतिहास नहीं बदल सकतीं। लेकिन ओबामा ने भारत के इतिहास पर उंगली नहीं उठाई है, सिर्फ पिछले कुछ वर्षों की ओर इशारा किया है। क्या इतिहास का हवाला देकर वर्तमान की एक कड़वी हकीकत पर परदा डाला जा सकता है? विडंबना यह है कि जेटली धार्मिक सहिष्णुता की भारत की जिस विरासत का हवाला दे रहे हैं उसे बचाए रखने का कोई जतन उनकी पार्टी नहीं कर रही है, उलटे भाजपा समेत संघ परिवार की सक्रियता उससे उलट दिशा में ही दिखती है। कुछ लोगों ने मान लिया है कि वे कुछ भी करें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। दिल्ली में त्रिलोकपुरी, फिर नंदनगरी, मजनू का टीला, बवाना में सांप्रदायिक तनाव भड़काने, एक के बाद एक कई गिरजाघरों में आगजनी की घटनाएं और ‘घर वापसी’ के नाम पर देश के विभिन्न इलाकों में धर्मांतरण के दबाव और गोडसे के महिमामंडन के प्रयास इसी के उदाहरण हैं। पिछले दिनों दिल्ली में एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री ने कहा कि मतदान करते समय लोग देश की अंतरराष्ट्रीय छवि का भी खयाल रखें। लेकिन क्या खुद उनकी सरकार और उनकी पार्टी ने पिछले आठ महीनों में कभी इस बात की परवाह की है कि धार्मिक असहिष्णुता की घटनाओं से दुनिया में भारत की कैसी छवि बन रही है?

ओबामा की टिप्पणी महज एक नमूना भर है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता को कमजोर करने की कोशिशों से दुनिया भर में गलत संदेश गया है। अमेरिका और भारत के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में बराबर बेहतर हुए हैं। फिर ओबामा पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जो दो बार भारत आए। मोदी सरकार के न्योते पर वे इस बार गणतंत्र दिवस समारोह के मेहमान बने। तब दिल्ली के सीरी फोर्ट आॅडिटोरियम में लोगों को संबोधित करते हुए ओबामा ने कहा था कि भारत तब तक प्रगति करता रहेगा जब तक वह सांप्रदायिक सौहार्द की राह पर चलता रहेगा। जो बात उन्होंने तब सांकेतिक ढंग से कही थी उसे अब थोड़ा स्पष्ट लहजे में कहा है। पर यह गौरतलब है कि पिछले हफ्ते वाशिंगटन में उनका भाषण धार्मिक सहिष्णुता के कोण से एक सामान्य वैश्विक आकलन था, प्रसंगवश उसमें भारत का भी जिक्र हुआ। गांधी का स्मरण भी। गांधी का अवसरोचित स्मरण मोदी भी करते हैं। मसलन, स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत उन्होंने गांधी जयंती के दिन की। अपनी आस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान गांधीजी की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद उन्होंने कहा था कि उन्हें गांधीजी से हमेशा प्रेरणा मिलती रही है। लेकिन क्या उनके मन में कभी यह सवाल उठता है कि पिछले कुछ महीनों की घटनाओं से गांधीजी क्या महसूस करते?

यों पिछले साल पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा था कि अगर देश को तेजी से विकास करना है तो लोग कम से कम दस साल के लिए जाति और धर्म के झगड़े भुला दें। लेकिन प्रधानमंत्री का काम केवल संदेश देना नहीं, उसके अनुरूप कार्रवाई करना भी है। यह हैरत की बात है कि कई बार जब प्रधानमंत्री को सख्ती दिखानी चाहिए, वे चुप्पी साधे रहते हैं। क्या यह कोई ‘कार्य-विभाजन’ है कि मोदी दुनिया को सुनाने के लिए भली-भली बातें करते रहें और उनके लोग सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों में लगे रहें? क्या इसी तरह सबका साथ सबका विकास के नारे पर अमल होगा!

 

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