ताज़ा खबर
 

अमन का रास्ता

पूर्वोत्तर में अलगाववादी गतिविधियों को समाप्त करने के मकसद से सरकार और एनएससीएन (आइएम) यानी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा) के बीच हुआ समझौता निस्संदेह ऐतिहासिक है। देश की आजादी के बाद से ही वहां वृहत्तर नगालिम राज्य के गठन की मांग होती रही है। हालांकि असम से अलग करके स्वतंत्र नगालैंड का गठन […]
Author August 5, 2015 02:04 am

पूर्वोत्तर में अलगाववादी गतिविधियों को समाप्त करने के मकसद से सरकार और एनएससीएन (आइएम) यानी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा) के बीच हुआ समझौता निस्संदेह ऐतिहासिक है। देश की आजादी के बाद से ही वहां वृहत्तर नगालिम राज्य के गठन की मांग होती रही है। हालांकि असम से अलग करके स्वतंत्र नगालैंड का गठन किया गया, पर यह मांग लगातार बनी रही कि नगा जाति के लोगों का विस्तार चूंकि असम और मणिपुर तक है, सबको मिला कर वृहत्तर नगालिम का गठन किया जाना चाहिए।

लेकिन इन राज्यों की सीमाओं के साथ छेड़छाड़ आसान काम नहीं था। इसलिए नगा विद्रोहियों के साथ सरकार किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी। इस तरह वहां जातीय गुटों की हिंसक गतिविधियों के चलते अशांति का माहौल बना हुआ था। करीब सोलह साल पहले एनएससीएन (आइएम) ने संघर्ष विराम पर सहमति जताई। तब से उसके नेताओं के साथ करीब अस्सी बैठकें हो चुकी हैं।

इस समझौते से स्वाभाविक ही पूर्वोत्तर में शांति का माहौल बनने की उम्मीद जगी है। चूंकि संसद का सत्र चल रहा है, इसलिए सरकार ने समझौते का ब्योरा जाहिर नहीं किया है। पर जिस गरमजोशी से एनएससीएन (आइएम) नेताओं ने समझौते पर हस्ताक्षर किए, उससे जाहिर है कि उनकी मांगें मान ली गई हैं और वे शांति प्रक्रिया बहाल करने में सहयोग को तैयार हैं।

हालांकि आशंका जताई जा रही है कि खापलांग गुट से सरकार ने उस तरह बातचीत का सिलसिला नहीं चलाया, जिस तरह एनएससीएन (आइएम) गुट के साथ वार्ता जारी रखी। माना जा रहा है कि खापलांग गुट सरकार के लिए सिरदर्द बना रहेगा। दो महीने पहले उसने सुरक्षा बलों पर हमला करके अपनी कड़ी नाराजगी का इजहार भी किया था। पर हकीकत यह है कि पूर्वोत्तर में सबसे बड़ा नगा विद्रोही गुट एनएससीएन (आइएम) का रहा है, इसके समझौते पर हस्ताक्षर के बाद खापलांग का विद्रोह अपने आप कमजोर पड़ गया है। खापलांग का आधार म्यांमा में है और इसके नेता भी वहीं के निवासी हैं। इसलिए उनके विद्रोह पर पूर्वोत्तर में अंकुश लगाना कठिन नहीं माना जा सकता। सबसे अधिक मुश्किल स्थितियां मणिपुर में पैदा होती रही हैं।

एनएससीएन (आइएम) के राजनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद वहां जातीय टकराव थमने की उम्मीद बनी है। पर इतने भर से सरकार की चुनौतियां समाप्त नहीं हो जातीं। पूर्वोत्तर में अशांति की वजह केवल वहां के जातीय गुटों में टकराव नहीं है। विकास कार्यक्रमों में असमानता वहां असंतोष का बड़ा कारण है। न तो वहां अच्छे शिक्षण संस्थान हैं, न स्वास्थ्य संबंधी माकूल व्यवस्था है। रोजगार के अवसर इस कदर कम हैं कि युवाओं को दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। फिर दूसरे राज्यों में अक्सर उन्हें अपमान झेलने पड़ते हैं। एनएससीएन (आइएम) गुट के साथ हुए समझौते में जिन शर्तों पर रजामंदी बनी है, उन पर सरकार को संजीदगी दिखानी होगी, नहीं तो वहां विद्रोह को पूरी तरह दबाना शायद ही आसान हो।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App