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मौसम की मार

तीन साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश दिया था कि वे ऐसे हर संभव उपाय करें, जिनसे जाड़े से ठिठुर कर किसी की मौत न होने पाए। तब ठंड से प्रभावित सभी राज्य सरकारों को पर्याप्त संख्या में रैन बसेरे बनाने को कहा गया था, जहां गली और पार्कों में खुले […]
Author December 23, 2014 14:01 pm

तीन साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश दिया था कि वे ऐसे हर संभव उपाय करें, जिनसे जाड़े से ठिठुर कर किसी की मौत न होने पाए। तब ठंड से प्रभावित सभी राज्य सरकारों को पर्याप्त संख्या में रैन बसेरे बनाने को कहा गया था, जहां गली और पार्कों में खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर गरीब लोग थोड़ी राहत पा सकें। मगर लगता है कि नागरिक हितों के प्रति अपनी जिम्मेदारी खुद निभाना तो दूर, सरकारों के लिए देश की शीर्ष अदालत तक के निर्देश या आदेश बहुत मायने नहीं रखते। यह बेवजह नहीं है कि कड़ाके की ठंड की मार झेलते हुए न सिर्फ बहुत सारे बेघर और गरीब लोग किसी तरह दो-ढाई महीने का वक्त काटते हैं, बल्कि हर साल सैकड़ों लोगों को जान गंवानी पड़ती है। यह समझना मुश्किल है कि कई बार महत्त्वहीन कार्यक्रमों पर पैसा बहाने वाली सरकारों की प्राथमिकता में जाड़े की मार झेलते लोगों की तकलीफ क्यों शुमार नहीं हो पाती! इस साल ठंड बढ़ने के साथ ही अब तक देश के अलग-अलग इलाकों में करीब पंद्रह लोगों के मरने की खबरें आ चुकी हैं, मगर इन्हें लेकर कोई राज्य सरकार गंभीर नहीं दिखी! गरीब और बेघर लोगों के लिए घर मुहैया कराना तो जैसे उनके सरोकार में ही नहीं रह गया है, पर रैन बसेरों और अलाव आदि का इंतजाम करना भी उन्हें जरूरी नहीं लगता! अदालतों की फटकार के बाद सरकार की ओर से औपचारिकता निभाने के लिए जो अस्थायी रैन बसेरे बनाए भी जाते हैं, वहां की बुनियादी सुविधाओं की हालत देख कर ज्यादातर जरूरतमंद उसमें शरण लेने से बचते हैं।

फिलहाल समूचा उत्तर भारत कड़ाके की ठंड और कोहरे की चपेट में है और राजस्थान में पारा दो डिग्री तक नीचे गिर चुका है। मौसम विभाग के मुताबिक अभी सर्दी और बढ़ेगी। जाहिर है, इसमें बेघर और गरीब तबके के लोगों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। सभी जानते हैं कि मौसम की मार से जान गंवाने वाले अधिकतर गरीब लोग होते हैं, जिनके पास रहने-खाने का ठिकाना नहीं होता। लेकिन अर्थव्यवस्था के ऊंचे ग्राफ से विकास का पैमाना तय करती सरकारों ने शायद ही इसे कभी दर्ज करने की कोशिश की कि देश में बेघर या रहने के लिए बदहाल ठिकानों पर किसी तरह वक्त काटते लोगों की वास्तविक संख्या क्या है। ऐसे दृश्य आम हैं, जहां खुले आसमान के नीचे काम करने या रहने को मजबूर लोगों में बहुतों के पास ओढ़ने या खुद को ढकने को कंबल-रजाई तो दूर, तापने को सूखी लकड़ियां भी मयस्सर नहीं होतीं। तकरीबन चार साल पहले दिल्ली में एक रैन बसेरे को गिराने और एक व्यक्ति की मौत की घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि किसी भी सभ्य और आधुनिक समाज में सरकार अपने नागरिकों को इस तरह मरने नहीं देगी। लेकिन हकीकत क्या है? ऐसा लगता है कि लोकतंत्र और जनकल्याण के सिद्धांतों पर कायम होने का दावा करने वाली हमारी सरकारों की प्राथमिकता सूची में देश के गरीब और कमजोर तबके के लोग नहीं हैं। किसी भी सरकार की संवेदनशीलता की परख आमतौर पर साधनहीन और समाज के हाशिये पर पड़े तबकों के लिए जरूरी सुविधाएं जुटाने के मामले में होती है। खासकर एक परिपक्व लोकतंत्र में सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह सबसे कमजोर या निर्धन लोगों की मदद के लिए खुद पहल करे और जरूरत पड़ने पर अलग से कानूनी व्यवस्था करे।

 

 

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