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संपादकीय: मालदीव की मुश्किल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बीते हफ्ते मालदीव के राजनीतिक संकट को लेकर फोन पर हुई बातचीत से कोई रास्ता निकलने के संकेत तो फिलहाल नहीं मिले हैं, पर इस बातचीत ने चीन को चिंतित कर दिया है।

Author February 12, 2018 01:32 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (सोर्स- फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बीते हफ्ते मालदीव के राजनीतिक संकट को लेकर फोन पर हुई बातचीत से कोई रास्ता निकलने के संकेत तो फिलहाल नहीं मिले हैं, पर इस बातचीत ने चीन को चिंतित कर दिया है। पिछले दिनों जब मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने वहां के पूर्व राष्ट्रपति नशीद समेत नौ प्रमुख राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार कर दिया, और पूर्व राष्ट्रपति मौमून गयूम के अलावा सर्वोच्च न्यायालय के जजों को भी गिरफ्तार कर लिया, तो अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में चीन अकेला प्रमुख देश था जिसने न तो इस घटनाक्रम की निंदा की न इस पर कोई चिंता जताई। दूसरी तरफ अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ के साथ ही भारत और श्रीलंका जैसे मालदीव के पड़ोसी देशों ने भी नशीद से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का सम्मान करने का आग्रह किया था। पर अब किसी को इसमें संदेह नहीं है कि नशीद अपनी तानाशाही को कायम रखने की पूरी कोशिश करेंगे। मालदीव जैसे बहुत छोटे-से देश के राष्ट्रपति के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की परवाह न करना आसान नहीं हो सकता। इसलिए नशीद चीन की मेहरबानी चाहते हैं।

चीन में खुद लोकतंत्र नहीं है। इसलिए उसे दुनिया में कहीं और लोकतंत्र की हत्या पर कोई दुख नहीं होता। अगर उसके आर्थिक और कूटनीतिक हित सध रहे हों, तो दुनिया में कहीं भी तानाशाही का साथ देने में वह संकोच नहीं करता। उसने यही म्यांमा में किया और यही मालदीव में कर रहा है। दिसंबर में चीन और मालदीव के बीच मुक्त व्यापार समझौता हुआ था। इस समझौते का हवाला देकर नशीद जहां बाहरी हस्तक्षेप की संभावना के खिलाफ चीन की मदद चाहते हैं, वहीं चीन पूरी तरह मालदीव को अपने प्रभाव में ले लेना चाहता है। यह न भारत को रास आ सकता है न अमेरिका को। सवाल है, क्या दोनों के पास मालदीव की दिशा को उलटने और चीन से निपटने की कोई रणनीति है? जार्डन से जारी भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान से जाहिर है कि मोदी और ट्रंप, दोनों मालदीव में विधि के अनुरूप शासन और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली की बहाली चाहते हैं। पर यह होगा कैसे?

एक बार, भारत ने मालदीव में अपने सैनिक भेजे थे। पर तब और अब की स्थिति में फर्क है। तब बाहरी आतंकियों से मालदीव को बचाने की वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति की गुहार पर भारत ने सैन्य मदद भेजी थी। मौजूदा स्थितियों में ऐसा करना किसी अन्य देश में दखलंदाजी की तरह देखा जा सकता है। कम से कम चीन तो यही मानेगा। यही नहीं, उसने परोक्ष रूप से भारत को चेतावनी भी दी है, यह कहते हुए कि चीन नहीं चाहता कि मालदीव एक और टकराव का मुद््दा बने। गौरतलब है कि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी, जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने तथा डोकलाम हाल में भारत और चीन के बीच कई बार तकरार के विषय बने हैं। अब मालदीव को लेकर भी भारत और चीन के रुख में जमीन आसमान का फर्क है। चीन को छोड़ दें, तो भारत के नजरिए से अंतरराष्ट्रीय समुदाय की रजामंदी है। सवाल है कि तानाशाही के चंगुल से मालदीव को निकालने और चीन की काट करने में इस सहमति का कैसे उपयोग किया जाए।

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