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प्रदूषण के कारण हुई थी इन कारखानों में तालाबंदी, फिर भी अवैध रूप चलाए जा रहे हैं कारखाने

सर्वोच्च न्यायालय की कड़ाई की वजह से प्रदूषण फैलाने वाले कारखाना मालिकों को नोटिस तो जारी कर दिया है।

Author Published on: November 22, 2019 2:40 AM
दिल्ली के भीतर अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अवैध रूप से कारखाने चलाए जा रहे हैं।

जब-जब दिल्ली की हवा और पानी में प्रदूषण का स्तर चिंताजनक स्तर पर पहुंचता है, पर्यावरण पर नजर रखने वाले महकमों की सक्रियता कुछ बढ़ जाती है। दिवाली के बाद दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया, तो राज्य सरकार ने चार पहिया वाहनों के लिए सम-विषम योजना लागू कर दी। इसी के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी समिति के निर्देश पर आवासीय इलाकों में चल रहे करीब छह हजार ऐसे कारखानों को नोटिस पकड़ाया गया है, जिनसे प्रदूषण फैलता है। यह पहला मौका नहीं है, जब दिल्ली के आवासीय इलाकों में चल रहे कारखानों पर नकेल कसने की पहल हुई है।

यमुना के पानी में सीमा से अधिक प्रदूषण बढ़ जाने पर भी इसी तरह कारखानों में तालाबंदी की पहल हुई थी, पर उसका कोई उल्लेखनीय नतीजा अभी तक सामने नहीं आया है। सवाल है कि आवासीय परिसरों में ऐसे कारखाने कैसे चलते रहते हैं, जो पर्यावरण प्रदूषण का बायस बनते हैं। करीब बीस साल पहले शहर के भीतर चल रहे कारखानों को दिल्ली से सटे राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों में बसाने का प्रयास किया गया था। दिल्ली से उजड़ कर उन क्षेत्रों में जाने वाले कारखानों को सस्ती दर पर जमीन उपलब्ध कराई गई थी, पर हकीकत यही है कि अब भी यहां बड़े पैमाने पर कारखाने चल रहे हैं।

दिल्ली के भीतर अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अवैध रूप से कारखाने चलाए जा रहे हैं। कारखाना मालिक ऐसा इसलिए भी कर लेते हैं कि दिल्ली के भीतर बसे गांवों और लालडोरा क्षेत्रों को नगर निगम के कायदे-कानूनों से राहत दी गई है। वहां भवन निर्माण और कारोबार करने संबंधी छूटें हासिल हैं। इसके अलावा अनेक ऐसे आवासीय क्षेत्र हैं, जो पहले अनधिकृत कॉलोनियों के रूप में विसित हुए थे और फिर उन्हें नियमित कर दिया गया।

उन इलाकों में जूते-चप्पल बनाने, स्टील के बरतन, लोहे के सामान बनाने, कपड़े की रंगाई, वस्त्र निर्माण, गाड़ियों की रंगाई-पुताई-धुलाई, कबाड़ तोड़ने-गलाने आदि से जुड़े कारखाने चलते हैं। इसके अलावा कई औद्योगिक क्षेत्रों में ऐसी इकाइयों को इस तर्क पर बने रहने दिया गया था कि उनसे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। उनकी आड़ में दूसरे कारखाने भी खुलते गए। ऐसे कारखानों की पोल तब खुलती है, जब उनमें आग लगने या भवन गिरने आदि की वजह से कोई बड़ा हादसा हो जाता है। हैरानी की बात है कि ऐसे कारखानों के बदस्तूर चलते रहने पर सरकारी महकमों की नजर क्यों नहीं जाती।

सर्वोच्च न्यायालय की कड़ाई की वजह से प्रदूषण फैलाने वाले कारखाना मालिकों को नोटिस तो जारी कर दिया है, पर उस पर कितनी कड़ाई से अमल किया जाएगा, दावा नहीं किया जा सकता। छिपी बात नहीं है कि दिल्ली में अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की मांग उठा कर या कारखाना मालिकों के बचाव में उतर कर किस तरह राजनीतिक दल अपना जनाधार मजबूत करने का प्रयास करते हैं। यह भी समझना मुश्किल नहीं है कि आवासीय क्षेत्रों में इतने बड़े पैमाने पर चल रहे कारखानों पर पर्यावरण विभाग के कर्मियों की नजर क्यों नहीं जाती। जाहिर है, यह कारखाना मालिकों के रसूख और बड़े अधिकारियों तक पहुंच की वजह से होता है। जब तक राजनीतिक दल और अधिकारी अपने निहित स्वार्थों से ऊपर उठ कर संजीदगी से दिल्ली के पर्यावरण की चिंता नहीं करेंगे, तब तक यहां प्रदूषण के स्तर में कमी के प्रयास विफल ही होंगे।

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