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संपादकीय: खतरे का पाठ

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वहां दिए जाने वाले व्याख्यानों में धर्म के मूल सिद्धांतों को किनारे रख कर कट्टरपंथ के पहलुओं पर जोर दिया जाता है, जिसका कैदियों के मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसमें ज्यादा गंभीर बात यह है कि इस खतरनाक योजना में युवा कैदियों को निशाने पर ज्यादा लिया जा रहा है।

Author Published on: February 27, 2018 2:41 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतकिरण के लिए किया गया है।

किसी मुकदमे में सजा पूरी करने के लिए या फिर विचाराधीन कैदियों को जब जेल में रखा जाता है तो एक मुख्य मकसद उनके भीतर सुधार लाना भी होता है। लेकिन अगर कोई जेल मामूली अपराधों के लिए बंद युवाओं को और ज्यादा खतरनाक अपराधी बनने के लिए प्रेरित करने का अड्डा बन जाए तो यह सरकार और संबंधित महकमे की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान है। खबर के मुताबिक एक आधिकारिक रिपोर्ट में ये तथ्य उजागर हुए कि श्रीनगर की केंद्रीय जेल के भीतर छोटे-मोटे अपराध की सजा काट रहे और विचाराधीन कैदियों को कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाने जैसी कवायदें चल रही हैं; जेल परिसर में करीब तीन सौ मोबाइल फोनों का संचालन हो रहा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वहां दिए जाने वाले व्याख्यानों में धर्म के मूल सिद्धांतों को किनारे रख कर कट्टरपंथ के पहलुओं पर जोर दिया जाता है, जिसका कैदियों के मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसमें ज्यादा गंभीर बात यह है कि इस खतरनाक योजना में युवा कैदियों को निशाने पर ज्यादा लिया जा रहा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि मामूली अपराधों के तहत जेल में सजा पूरी कर जो युवा फिर से समाज की मुख्यधारा में लौट कर सामान्य जीवन जी सकता था, वह जेल में चल रही उन अवांछित गतिविधियों के असर में कैसे एक ज्यादा खतरनाक अपराधी बन सकता है या फिर किसी आतंकवादी संगठन की चपेट में आ सकता है।

सवाल है कि देश की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली जेल में अगर एक तरह से सुनियोजित और संगठित तरीके से कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाली गतिविधियां संचालित की जा रही हैं तो इसकी जिम्मेदारी किस पर होनी चाहिए! जेलों में कैदियों पर निगरानी करने से लेकर तकनीकी संसाधनों के जरिए सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने में कोताही के लिए कौन जवाबदेह है? हालांकि जेलों में कैदियों के मोबाइल या दूसरी सुविधाएं हासिल कर लेने या मनमानी करने का यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। हफ्ते भर पहले राजस्थान की जोधपुर जेल में बर्बर तरीके से एक व्यक्ति की हत्या करने के मामले में बंद शंभूलाल रेगर नाम के एक कैदी ने बाकायदा मोबाइल से एक खास समुदाय के खिलाफ नफरत से भरे संदेश का वीडियो बना कर लोगों को भेज दिया। इस तरह की घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि जेलों में सुरक्षा व्यवस्था और कैदियों की निगरानी की व्यवस्था में कैसी लापरवाही बरती जाती है।

यों देश की ज्यादातर जेलों में निर्धारित क्षमता से काफी ज्यादा संख्या में कैदियों को रखे जाने से लेकर उनके रहन-सहन या खानपान की बदहाली की तस्वीर कोई छिपी बात नहीं है। दूसरी ओर, ऐसी खबरें अक्सर आती रहती हैं जिनमें किसी जेल में कुछ खास या ऊंचे रसूख वाले कैदियों के लिए चारदिवारी के भीतर भी विशेष सुविधाओं का इंतजाम हो जाता है। वह मोबाइल का इस्तेमाल हो या फिर दूसरी कई सुविधाएं, उन्हें सामान्य घरेलू जीवन जीने में कोई दिक्कत नहीं होती। जब एकाध ऐसी खबर तूल पकड़ लेती है तब सरकार या संबंधित महकमे दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कहते हैं। लेकिन सच यह है कि जेल में तैनात सुरक्षाकर्मियों से लेकर अधिकारियों तक के स्तर पर कई बार कुछ खास कैदियों के साथ मिलीभगत होती है या फिर इस मामले में व्यापक कोताही बरती जाती है। लेकिन अगर अपराधियों के सजा काटने या उनके भीतर सुधार करने के बजाय जेलों में उनके और ज्यादा खतरनाक होने के हालात बनाए जा रहे हैं तो भविष्य में आतंकवाद या दूसरी अप्रिय स्थितियों के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा?

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