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कैसी मेहरबानी

जब भी निजीकरण की वकालत की जाती है तो अक्सर सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार का हवाला दिया जाता है। मगर इस बात पर शायद ही कोई चर्चा होती है कि निजी कंपनियां किस तरह गोपनीय सरकारी दस्तावेजों को हासिल करने, विभागों और मंत्रालयों की निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए बाबुओं को तरह-तरह के रिश्वत […]

जब भी निजीकरण की वकालत की जाती है तो अक्सर सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार का हवाला दिया जाता है। मगर इस बात पर शायद ही कोई चर्चा होती है कि निजी कंपनियां किस तरह गोपनीय सरकारी दस्तावेजों को हासिल करने, विभागों और मंत्रालयों की निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए बाबुओं को तरह-तरह के रिश्वत या लालच देती हैं और अपने कारोबारी स्वार्थ साधने के क्रम में वे सत्ताधारियों, अन्य रसूखदार राजनीतिकों पर भी मेहरबानी लुटाती हैं। इसे चाहें क्रोनी कैपिटलिज्म का नाम दें, पर यह असल में व्यवस्था में सेंध लगाना है। एस्सार कंपनी के बारे में हुआ खुलासा ऐसे ही हथकंडों की एक बानगी है।

गौरतलब है कि एक विसलब्लोअर यानी एस्सार के ही एक पूर्व कर्मचारी ने कंपनी के अनेक अधिकारियों के पत्राचार को उजागर करके बताया है कि कंपनी ने रसूखदार लोगों को उपकृत करने के लिए क्या-क्या तरीके अपनाए। जुटाए गए पत्राचार में ई-मेल, सरकारी अधिकारियों के साथ हुई बातचीत से संबंधित पत्र-संदेश, नौकरशाहों, राजनीतिकों, पत्रकारों को पहुंचाए गए फायदों से जुड़ी जानकारियां हैं। इनमें निहित एक तथ्य यह है कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने जुलाई 2013 में विदेश में कंपनी की शाही नौका में अपने परिवार के साथ दो रातें गुजारीं। तब के कोयलामंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और भाजपा के वरुण गांधी ने कई लोगों को नौकरी देने के लिए कंपनी को सिफारिशी पत्र लिखे थे।

गडकरी ने अपनी सफाई में कहा है कि तब वे मंत्री नहीं थे, और पार्टी के अध्यक्ष पद से हट चुके थे, इसलिए वे कंपनी को कोई फायदा नहीं पहुंचा सकते थे, और इस तरह हितों के टकराव का कोई मामला नहीं बनता है। वहीं नौकरी के लिए सिफारिशी पत्र लिखने वाले राजनीतिकों का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में होने के कारण इस तरह के सिफारिशी पत्र लिखना उनके लिए स्वाभाविक बात है। पर खुलासे से पता चलता है कि कंपनी ने दो सौ पद इस तरह की सिफारिशों के लिए तय कर रखे थे, यानी यह मेहरबानी लुटाने की उसकी रणनीति का हिस्सा था। कंपनी ने अधिकारियों से लेकर साधारण कर्मचारियों तक, तोहफे बांटने की भी तरकीब अपनाई ताकि गोपनीय सरकारी दस्तावेजों तक अवैध रूप से पहुंच बनाने में सुभीता हो। मंत्रियों से प्रेस-कॉन्फ्रेंस के दौरान अपने मतलब के सवाल पुछवाने, अपने अनुकूल खबरें छपवाने, प्रतिकूल खबरों को रुकवाने के मकसद से कई पत्रकारों को भी कंपनी ने उपकृत किया, उन्हें टैक्सी की परिवहन-सुविधा उपलब्ध कराई। 2-जी मामले में भी कुछ पत्रकारों पर कॉरपोरेट बिचौलिये की भूमिका निभाने के आरोप लग चुके हैं। जब साधारण दर्जे के कर्मचारियों और संवाददाताओं को कंपनी अपने फायदे के लिए साधने में लगी रही, तो गडकरी जैसे एक बड़ी पार्टी के वरिष्ठ नेता को सपरिवार सैर-सपाटे की सुविधा मुहैया कराना क्या बिना मतलब के रहा होगा?

खुलासे को एस्सार ने सूचना-चोरी कहा है और इसकी तुलना पिछले दिनों पेट्रोलियम सहित कई मंत्रालयों की फाइलें चुराने की घटना से की है। पर यह तुलना निहायत बेतुकी है, क्योंकि मंत्रालयों से दस्तावेजों की चोरी करने वालों का मकसद गोरखधंधे को उजागर करना नहीं, बल्कि दस्तावेज चुरा कर उन्हें दलालों और ‘ग्राहक’ कंपनियों को बेचना और इस प्रकार पैसा बनाना था। कंपनी की सफाई खुलासे से उपजी घबराहट में लीपापोती करने के अलावा और क्या है? मंत्रालयों के दस्तावेजों के लीक होने के मामले में एस्सार का भी नाम आया। विसलब्लोअर के जरिए सामने आई जानकारी से कंपनी एक बार फिर सवालों में घिर गई है। पर सबसे अहम सवाल यह है कि क्या हमारे राज-काज की प्रक्रियाएं इतनी कमजोर हो चुकी हैं कि वहां कोई भी आसानी से सेंध लगा सकता है!

 

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