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सुरक्षा और सरकार

सुरक्षा के मामले में नाकामी और प्रकट रूप से केंद्र के इशारे पर काम करने के जितने आरोप पिछले एक-डेढ़ साल में दिल्ली पुलिस पर लगे हैं, उतने शायद पहले कभी नहीं लगे।

Author Published on: January 22, 2016 3:05 AM
सुरक्षा और सरकार

सुरक्षा के मामले में नाकामी और प्रकट रूप से केंद्र के इशारे पर काम करने के जितने आरोप पिछले एक-डेढ़ साल में दिल्ली पुलिस पर लगे हैं, उतने शायद पहले कभी नहीं लगे। ऐसे में उचित ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसके पास पर्याप्त कर्मी न होने के कारण माकूल सुरक्षा-व्यवस्था उपलब्ध कराना मुश्किल बना हुआ है।

उसका तर्क है कि उसे चौंसठ हजार कर्मियों की जरूरत थी, मगर केंद्र ने वह संख्या घटा दी, नतीजतन पुलिसकर्मियों की संख्या महज चौदह हजार रह गई। विचित्र है कि गृह मंत्रालय ने चौदह हजार अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की भरती की इजाजत दी थी, मगर वित्त मंत्रालय ने उसे मंजूर नहीं किया। इस पर अदालत ने केंद्र से पूछा है कि क्या नागरिकों से मिलने वाले टैक्स का उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने में सही ढंग से उपयोग हो पा रहा है?

अगर गृह मंत्रालय ने अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की भरती को मंजूरी दी थी तो वित्त मंत्रालय के उसमें रोड़े अटकाने की कोई तुक नहीं है। लंबे समय से यह बात कही जा रही है कि आबादी के अनुपात में दिल्ली पुलिस के पास कर्मचारी नहीं हैं, हर मुहल्ले पर नजर रखने के लिए जरूरी चौकियां नहीं हैं। इसके चलते राजधानी में अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ा है। फिर भी केंद्र सरकार को क्यों पुलिसबल को सशक्त, मुस्तैद और अत्याधुनिक सूचना प्रणाली से युक्त बनाने की जरूरत महसूस नहीं हो रही! यह केवल पैसे की कमी का मामला नहीं है। इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का पहलू ज्यादा अहम है।

दिल्ली में बढ़ते अपराध और पुलिस की नाकामी के चलते लोगों के असंतोष को देखते हुए दिल्ली सरकार की मांग है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी उसके हाथों में सौंप दी जाए। यह मांग भाजपा ने ही शुरू की थी और बरसों-बरस इसे लगातार उठाती रही। आज केंद्र में भाजपा की सरकार है। मगर केंद्र को दिल्ली पुलिस की कमान दिल्ली सरकार के हाथों में देना मंजूर नहीं। रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों की वजह से दिल्ली की आबादी हर साल एक छोटे-मोटे शहर के बराबर बढ़ जाती है। सड़कों पर हर साल हजारों नए वाहन उतर आते हैं और दिन-ब-दिन यातायात और परेशानी-भरा होता गया है।

मगर केंद्र का पुलिस बल को उस अनुपात में बढ़ाने के बजाय घटाने का फैसला विचित्र है। फिर समस्या केवल पुलिसकर्मियों की कमी नहीं, राजनीतिक मंशा से पुलिस के इस्तेमाल की भी है। दिल्ली पुलिस के कामकाज के तरीके से कई बार जाहिर हो चुका है कि वह वही करती है, जो केंद्र सरकार चाहती है। यहां तक कि दिल्ली पुलिस के आयुक्त ने सार्वजनिक रूप से यह कह कर खुद को सवालों के घेरे में खड़ा कर लिया कि गनीमत है, उन्हें दिल्ली सरकार के अधीन काम नहीं करना पड़ता। जब पुलिस बल का मुखिया खुद इस तरह राजनीतिक समीकरण साधने का इच्छुक दिखे तो मातहत अधिकारियों-कर्मचारियों से भला कितनी संजीदगी की उम्मीद की जा सकती है।

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