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संपादकीय: घोटाला और जवाबदेही

पीएनबी घोटाला आखिर है कितना बड़ा है, यह अभी तक तय नहीं हो पाया है। पहले ग्यारह हजार चार सौ करोड़ था, फिर बारह हजार सात सौ करोड़ तक पहुंच गया। अब सीबीआइ का कहना है कि यह घोटाला और बड़ा हो सकता है। यह सारे एलओयू यानी लैटर ऑफ अंडरटेकिंग मिलने के बाद ही पता चलेगा।

PNBतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

पंजाब नेशनल बैंक में हुए अरबों रुपए के घोटाले को लेकर जांच और पूछताछ का दायरा बैंकों के शीर्ष प्रबंधन तक पहुंच चुका है। सीबीआइ और प्रवर्तन निदेशालय के बाद अब वित्त मंत्रालय के तहत आने वाला गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआइओ) भी तेजी से जांच में जुट गया है। इस महकमे ने बुधवार को पीएनबी के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी से पूछताछ की। इससे पहले देश के दो सबसे बड़े निजी बैंकों- आइसीआइसीआइ और एक्सिस बैंक के प्रमुखों को पूछताछ के लिए नोटिस भेजा। एसएफआइओ उन सभी बैंकों के प्रमुखों से भी पूछताछ करेगा, जिन्होंने नीरव मोदी-मेहुल चोकसी को कर्ज दिया। हालांकि जांच की जटिल प्रक्रिया और रफ्तार को देखते हुए लगता नहीं कि बहुत जल्दी किसी ठोस नतीजे पर पहुंचा जा सकेगा। लेकिन हैरानी की बात है कि कर्ज लेकर भागने वालों ने जांच एजंसियों और बैंक प्रबंधनों को जिस तरह धता बताते हुए जांच में सहयोग देने से इनकार कर दिया है, उससे निपटने का रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा।

पीएनबी घोटाला आखिर है कितना बड़ा है, यह अभी तक तय नहीं हो पाया है। पहले ग्यारह हजार चार सौ करोड़ था, फिर बारह हजार सात सौ करोड़ तक पहुंच गया। अब सीबीआइ का कहना है कि यह घोटाला और बड़ा हो सकता है। यह सारे एलओयू यानी लैटर ऑफ अंडरटेकिंग मिलने के बाद ही पता चलेगा। मालूम चला है कि कई एलओयू मोदी-चोकसी की कंपनियों को लौटा दिए गए थे। इन एलओयू के जरिए ही सारा घोटाला चलता रहा। ऐसे में यह सवाल गौण हो जाता है कि घोटाला कितना बड़ा है। बड़ा सवाल है कि कैसे इतने सालों से कुछ लोग बैंक अफसरों के साथ सांठगांठ से लूट मचाते रहे और किसी को भनक तक नहीं लगी। यह बैंकिंग व्यवस्था के खोखलेपन को दर्शाता है। यह बैंकों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। इस घोटाले का असली साजिशकर्ता गीताजंलि समूह का उपाध्यक्ष भी गिरफ्तार हो चुका है। कुल मिलाकर अब तक बीस लोग पकड़े गए हैं। लेकिन असली सूत्रधार कौन हैं और उनके तार कहां जुड़े हैं, यह पता लगा पाना जांच एजंसियों के लिए बड़ी चुनौती है।

आखिर इतने बड़े घोटाले का जिम्मेदार है कौन? किसको जवाबदेह ठहराया जाए? सरकार और बैंक प्रबंधनों को इस बारे में सोचना होगा। बैंकों का नियामक रिजर्व बैंक जिस तरह काम कर रहा है, उससे भी संदेह तो पैदा होता है। घोटाला सामने आने के बाद पंजाब नेशनल बैंक ने वित्त मंत्रालय को सौंपी रिपोर्ट में बताया था कि रिजर्व बैंक ने नौ साल से बैंक का ऑडिट नहीं किया था। रिजर्व बैंक को इस बात का पूरा अधिकार है कि वह किसी भी बैंक खाते की कभी भी जांच कर सकता है। रिजर्व बैंक के पास अपने ऑडिटर होते हैं। ऐसे में इस सवाल का जवाब कौन देगा कि इतने लंबे समय से पीएनबी का ऑडिट क्यों नहीं हुआ? बैंक का शीर्ष प्रबंधन आखिर क्या करता रहा? ये ऐसे सवाल हैं, जिनमें जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर जवाबदेही तय कर दी जाए, तो शायद ऐसे घोटाले न हों और जांच एजंसियों के लिए नतीजे पर पहुंचना आसान होगा। जिस तरह सरकार, बैंक प्रबंधन और जांच एजंसियां अब चौकस हुई हैं, अगर पहले से ही ऐसी सतर्कता बरती जाती और कड़े नियमों का पालन होता तो ऐसे घोटालों से बचा जा सकता था।

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