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लापरवाह पुलिस

हत्या, लूट या किसी आपराधिक वारदात के बाद पुलिस के पहुंचने में देरी की वजह से अपराधियों के भाग निकलने की खबरें अक्सर मिलती रहती हैं। पर ऐसे मामलों में हमेशा पुलिस अधिकारी यही सफाई देते हैं कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने सही वक्त पर पहुंचने की हर संभव कोशिश की। हालांकि अपनी कोताही […]

Author August 9, 2015 4:49 PM

हत्या, लूट या किसी आपराधिक वारदात के बाद पुलिस के पहुंचने में देरी की वजह से अपराधियों के भाग निकलने की खबरें अक्सर मिलती रहती हैं। पर ऐसे मामलों में हमेशा पुलिस अधिकारी यही सफाई देते हैं कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने सही वक्त पर पहुंचने की हर संभव कोशिश की। हालांकि अपनी कोताही से इनकार करने वाली पुलिस जब अपने ही किसी कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है तो उसे इन आरोपों का कोई जवाब नहीं सूझता।

कानपुर के एसएसपी यानी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने जब ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की परीक्षा लेनी चाही, तो उन्हें हैरान करने वाले अनुभव हुए। उन्होंने खुद पुलिस नियंत्रण कक्ष में फोन करके लूट की फर्जी खबर, लुटेरों का हुलिया और उनके भागने के बारे में झूठा ब्योरा दिया। उसके बाद वे अपने एक साथी को लेकर लुटेरे के भेष में यह देखने निकल गए कि उनका महकमा कितना सक्रिय हुआ है। पर उन्हें वही लापरवाही दिखाई पड़ी, जिसका आरोप पुलिस पर बराबर लगता रहता है।

वे मोटरसाइकिल पर शहर भर में घूमते रहे, पर कहीं भी पुलिस चौकस नहीं दिखी, किसी भी निगरानी चौकी पर उन्हें नहीं रोका गया। यही नहीं, नियंत्रण कक्ष को जिस वक्त उन्होंने फोन किया था, उसने यह जानकारी प्रसारित करने में बीस मिनट लगा दिए। यह अलग बात है कि सख्त एसएसपी ने आठ पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर किया और छह पुलिस थानों के क्षेत्राधिकारियों को चेतावनी दी। लेकिन हर वक्त ड्यूटी पर चौकस रहने का दावा करने वाली पुलिस वास्तव में अपनी जिम्मेदारी कैसे निभाती है, यह वाकया इसका सबूत है।

अगर सूचना मिलने के बाद पुलिस सही वक्त पर पहुंच जाए तो अपराधियों को पकड़ना या उन्हें किसी वारदात को अंजाम देने से रोकना आसान हो सकता है। यह बेवजह नहीं है कि पुलिस पर अपराधियों के साथ सांठगांठ के आरोप लगाए जाते हैं। थानों तक में स्थिति इससे अलग नहीं है। ऐसी शिकायतें अक्सर सामने आती रहती हैं कि किसी घटना के बारे में पीड़ित ने थाने जाकर गुहार लगाई और ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने उसकी उपेक्षा की या फिर किसी के प्रभाव में आकर उलटे उसे ही प्रताड़ित किया। थाने में बलात्कार या हिरासत में मौत के कई मामले उजागर हो चुके हैं।

सवाल है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और जनता की सुरक्षा के लिए बहाल पुलिसकर्मी अपना कर्तव्य पालन ठीक से क्यों नहीं करते! इसका जवाब इस महकमे में पसरे व्यापक भ्रष्टाचार और कामकाज की सामंती शैली में छिपा है, जिसमें कमजोर तबकों के लोगों की तकलीफों के लिए जगह नहीं होती और रसूखदार लोगों का प्रभाव काम करता है। इस स्थिति से निपटने के लिए पुलिस सुधार का मसला लंबे समय से अधर में लटका हुआ है। यह समझना मुश्किल है कि इस मामले में सरकारें क्यों उदासीन हैं!

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