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संपादकीय : महंगाई की मार

महंगाई बढ़ने से उद्योग जगत भी हलकान है। उसे समझ नहीं आ रहा कि डीजल महंगा होने से जो आयात खर्च बढ़ेगा, उससे कैसे पार पाया जाए। इसका सीधा असर विनिमय दर पर पड़ता है। इसके अलावा और भी पहलू हैं जो उद्योगों की रफ्तार को थामते हैं। बेकाबू महंगाई लागत को भी प्रभावित करती है। इसी महीने रिजर्व बैंक ने भी जो रेपो दरें बढ़ाई, उसका मूल कारण भी महंगाई में ही अंतर्निहित है।

Author Published on: June 16, 2018 3:13 AM
अप्रैल में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 0.87 फीसद थी, जो अगले महीने यानी मई में 1.60 फीसद पर पहुंच गई।

मई में थोक महंगाई का चार फीसद से ऊपर यानी 4.43 फीसद पर पहुंचना परेशान करने वाला है। खुदरा महंगाई इससे कुछ अधिक ही होगी, और उपभोक्ताओं का वास्ता खुदरा कीमतों से ही पड़ता है। गुरुवार को जारी हुए थोक मुद्रास्फीति के आंकड़े बता रहे हैं कि थोक महंगाई की यह दर पिछले चौदह महीनों में सबसे ज्यादा है। पिछले साल मई में थोक महंगाई का यह आंकड़ा 2.26 फीसद रहा था। यानी इन चौदह महीनों में थोक महंगाई दुगुनी हो गई। इस साल अप्रैल से मई के बीच महंगाई का ग्राफ तेजी से बढ़ा। अप्रैल में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 0.87 फीसद थी, जो अगले महीने यानी मई में 1.60 फीसद पर पहुंच गई। इसी तरह र्इंधन और बिजली क्षेत्र में महंगाई दर मई में 11.22 फीसद दर्ज की गई, जो ठीक पिछले महीने यानी अप्रैल में 7.85 फीसद रही थी। आंकड़ो में यह तेज उछाल बताता है कि एक ही महीने में महंगाई की दर डेढ़ से दोगुनी हो गई। इससे पहले खुदरा महंगाई के आंकड़े आए थे। खुदरा महंगाई पिछले चार महीने में सबसे ज्यादा 4.87 प्रतिशत पर पहुंच गई थी।

सब जानते हैं कि इस महंगाई का मूल कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में छिपा है। पिछले महीने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों ने वृद्धि का जो रेकार्ड बनाया था, उसने आमजन की नींद उड़ा दी थी। कई शहरों में पेट्रोल अस्सी रुपए और डीजल पैंसठ रुपए के स्तर को पार कर गया। ऐसे में महंगाई का बढ़ना लाजिमी है। सरकार यह सफाई देती रही कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से ही पेट्रोल-डीजल महंगे हुए हैं। लेकिन उसने इन पर लगाम लगाने के लिए ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जो जनता को राहत पहुंचाता। सरकारें पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले करों से अपने खजाने भरने में लगी हैं। मई महीने में ही फलों और सब्जियों के दामों ने भी लोगों का बजट बिगाड़ा। आलू की महंगाई दर 81.93 फीसद रही। फलों की महंगाई दर भी 15.40 फीसद दर्ज हुई। अगर पेट्रोल-डीजल में आग न लगी होती तो खाने-पीने का सामान इतना महंगा नहीं होता। इसीलिए जनता और उद्योग संगठन, दोनों सरकार से तेल के दाम काबू करने की मांग कर रहे हैं।

महंगाई बढ़ने से उद्योग जगत भी हलकान है। उसे समझ नहीं आ रहा कि डीजल महंगा होने से जो आयात खर्च बढ़ेगा, उससे कैसे पार पाया जाए। इसका सीधा असर विनिमय दर पर पड़ता है। इसके अलावा और भी पहलू हैं जो उद्योगों की रफ्तार को थामते हैं। बेकाबू महंगाई लागत को भी प्रभावित करती है। इसी महीने रिजर्व बैंक ने भी जो रेपो दरें बढ़ाई, उसका मूल कारण भी महंगाई में ही अंतर्निहित है। पिछले छह महीनों में खुदरा मुद्रास्फीति का ग्राफ जिस तरह बढ़ रहा था, उससे रिजर्व बैंक भी चिंतित दिखा। इसलिए पिछले चार साल में पहली बार रिजर्व बैंक को ऐसा कड़ा कदम पड़ा। हालांकि केंद्रीय बैंक के इस कदम से बैंकों का कर्ज महंगा होगा और सीधा बोझ उन लोगों की जेब पर पड़ेगा जो मकान और वाहन की किस्तें चुका रहे हैं। ऐसे में चाहे थोक हो या खुदरा मुद्रास्फीति, इस पर काबू पाने के लिए तार्किक उपाय निकाले जाने की जरूरत है।

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