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श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने एक ऐसी बात कही है जो निहायत अप्रत्याशित है। उन्होंने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में भारत के मछुआरों पर उत्तरी श्रीलंका के मछुआरों की आजीविका छीनने का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके देश के जलक्षेत्र में घुसने पर भारतीय मछुआरों को गोली मारी जा सकती है, […]

Author March 9, 2015 10:25 PM

श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने एक ऐसी बात कही है जो निहायत अप्रत्याशित है। उन्होंने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में भारत के मछुआरों पर उत्तरी श्रीलंका के मछुआरों की आजीविका छीनने का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके देश के जलक्षेत्र में घुसने पर भारतीय मछुआरों को गोली मारी जा सकती है, और इसमें कोई मारा जाता है तो कुछ भी गलत नहीं होगा, क्योंकि कानून ऐसा करने की इजाजत देता है। उनके इस बयान पर स्वाभाविक ही विवाद उठा है। भारत और श्रीलंका के बीच मछुआरों के समुद्री सीमा के अतिक्रमण के मसले पर कई बार बातचीत हुई है और इन वार्ताओं में इस बात पर जोर दिया गया है कि ऐसे मामलों को एक मानवीय समस्या की तरह देखा जाए और उन्हें संवेदनशील ढंग से सुलझाने की कोशिश हो। इस नजरिए की बानगी भी कई बार सामने आई है। दोनों देशों ने अपने यहां बंद एक दूसरे के मछुआरों को कई बार रिहा किया है। पिछले साल नवंबर में तो श्रीलंका सरकार ने दो कदम और आगे बढ़ कर उदारता का परिचय दिया था, जब श्रीलंका की एक अदालत से मृत्युदंड पाए भारत के पांच मछुआरों को तब के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने माफी दे दी। राजपक्षे का चीन की तरफ झुकाव किसी से छिपा नहीं था, जिसकी वजह से भारत और श्रीलंका के रिश्तों में थोड़ी खटास भी आई। उनके उत्तराधिकारी यानी राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने चीन की तरफ ज्यादा झुकाव की नीति छोड़ते हुए भारत से संबंध बेहतर बनाने की पहल की और अपने पहले विदेश दौरे के लिए दिल्ली को चुना। इसलिए रानिल विक्रमसिंघे का बयान और भी खटकता है।

फिर, विक्रमसिंघे ने विवादित टिप्पणी ऐसे समय की, जब भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज श्रीलंका के दौरे पर थीं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ दिन बाद श्रीलंका जाने वाले हैं। जिस समय दोनों तरफ से आपसी सहयोग के कई नए समझौतों की तैयारी चल रही हो, इस बयान ने सारी कवायद पर एक सवालिया निशान लगा दिया है। विक्रमसिंघे ने अपनी टिप्पणी के क्रम में श्रीलंका की समुद्री सीमा का अतिक्रमण करने वाले भारतीय मछुआरों की तुलना उन दो इतालवी नौसैनिकों से की, जिन्हें भारतीय नौसेना ने हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया था। जैसा कि विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भी कहा है, यह तुलना निहायत बेतुकी है। अलबत्ता बिक्रमसिंघे की दूसरी बात विचारणीय है कि एक उचित समझौता होना चाहिए, पर उत्तरी श्रीलंका के मछुआरों की आजीविका की कीमत पर नहीं। आखिर ऐसी स्थिति कैसे आई कि दोनों तरफ के मछुआरों के हितों में टकराव दिख रहा है? समुद्री सीमा के अतिक्रमण की शिकायतें हमेशा रही हैं, पर बड़े ट्रालरों के जरिए मछली पकड़ने की इजाजत के चलते जब मत्स्य संपदा तेजी से खाली होने लगी, तो ऐसी घटनाएं काफी बढ़ गर्इं। मछुआरों को अब मछली पाने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता है। इसलिए बड़े ट्रालरों पर रोक लगनी चाहिए। फिर, अतिक्रमण के मामलों को सुलझाने के लिए एक संवेदनशील व्यवस्था बनाई जाए।

यह सही है कि श्रीलंका अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के तकाजे की अनदेखी नहीं कर सकता। मगर यह बात हर देश पर लागू होती है। अहम सवाल यह है कि क्या अपनी रोजी-रोटी के सिलसिले में जाने-अनजाने समुद्री सीमा लांघ जाने वाले लोगों के साथ वैसा सलूक किया जाना ठीक होगा, जैसा आतंकवादियों के साथ होता है? मछुआरों का मछली पकड़ने के क्रम में पड़ोसी देश के जलक्षेत्र में जले जाना ऐसा अपराध नहीं हो सकता कि उन्हें गोली मार दी जाए, या उन्हें बरसों-बरस जेल में सड़ना पड़े। यह बेहद अफसोस की बात है कि उन्हें गोली मारने की बात एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री ने कही है, जो बौद्ध परंपरा में विश्वास करता है, और जिसके साथ भारत के रिश्ते हमेशा दोस्ताना रहे हैं!

 

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