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उलटा राग

इस बार चीन ने भारत पर अतिक्रमण का आरोप लगाया है, और इसी बिना पर उसने भारतीय तीर्थयात्रियों को नाथू ला के रास्ते होकर कैलाश मानसरोवर जाने की इजाजत नहीं दी।

Hurriyat Conference, jammu kashmir, Chinese troops in PoK, pakistan occupied kashmir, azad kashmir, people liberation army, PLA in kashmir, omar abdullah, indian army, india china, india pakistan, हुर्रियत कांफ्रेंस, जम्‍मू कश्‍मीर, भारत, पाकिस्‍तान, चीन, आजाद कश्‍मीर, पाक अधिकृत कश्‍मीरपिछले दिनों चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुस्‍ आए थे। साथ ही पाक अधिकृत कश्‍मीर में भी नजर आए थे।

चीन के साथ भारत का सीमा विवाद पुराना है। कभी-कभी इसकी वजह से दोनों तरफ के सैनिक टकरा जाते हैं, या गलतफहमी पैदा हो जाती है, पर यह अक्साई चिन या अरुणाचल प्रदेश से लगी सीमा पर होता आया है। इस लिहाज से, ताजा तकरार नई घटना है, क्योंकि यह सिक्किम से लगे सीमावर्ती क्षेत्र में हुई है। विडंबना यह है कि पहले के वाकयों के विपरीत, इस बार चीन ने भारत पर अतिक्रमण का आरोप लगाया है, और इसी बिना पर उसने भारतीय तीर्थयात्रियों को नाथू ला के रास्ते होकर कैलाश मानसरोवर जाने की इजाजत नहीं दी। फलस्वरूप इन तीर्थयात्रियों को लौट आना पड़ा। चीन ने कहा है कि जब तक ‘गतिरोध’ दूर नहीं हो जाता, वह नाथू ला के रास्ते से (यानी तिब्बत होकर) कैलाश मानसरोवर जाने की अनुमति नहीं देगा। सवाल है कि यह गतिरोध क्या है, क्यों पैदा हुआ, इसका जिम्मेवार कौन है। चीन का कहना है कि पिछले दिनों भारत के सैनिकों ने डोका ला क्षेत्र में आकर वहां हो रहे निर्माण-कार्य पर एतराज किया और बाधा डाली, जबकि यह क्षेत्र चीनी भूभाग का हिस्सा है। इस पर दिल्ली में चीन के राजदूत ने भारतीय विदेश मंत्रालय से तो विरोध जताया ही, चीन के विदेश मंत्रालय ने बेजिंग में भारतीय राजदूत से भी अपनी नाराजगी जताई। यही नहीं, चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों के दो बंकर ध्वस्त कर दिए, यह कहते हुए कि ये उसकी सीमा में बने थे।

इस घटनाक्रम के सिलसिले में कई सवाल उठते हैं। जब चीन ने कूटनीतिक स्तर पर अपना विरोध दर्ज करा दिया, तो भारत के जवाब या स्पष्टीकरण का इंतजार उसने क्यों नहीं किया। यही नहीं, उसने विवाद को यहां तक खींचा कि कैलाश मानसरोवर की यात्रा भी उसकी बलि चढ़ गई, जबकि इससे बचा जा सकता था। भारत ने कभी भी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण नहीं किया। डोंगलांग या डोका ला का मामला कुछ अलग तरह का है। इस क्षेत्र पर चीन का कब्जा है, मगर भूटान भी इस पर अपना दावा जताता है। अगर भारतीय सैनिकों ने डोंगलांग में निर्माण-कार्य किए जाने पर एतराज किया होगा, तो इसीलिए कि भूटान कूटनीतिक और रक्षा के मामले में भारत पर निर्भर है। चीन भी भूटान और भारत के इस रिश्ते को जानता है। चीन अगर दलाई लामा के अरुणाचल जाने पर विरोध जता सकता है, तो भूटान के दावे वाले क्षेत्र में चीन के स्थायी निर्माण करने पर भारत आपत्ति क्यों नहीं कर सकता?

ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब चीन ने दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा का विरोध करते हुए कहा था कि भारत को इसका परिणाम भुगतना होगा। लेकिन उसने भारत को चोट पहुंचाने का यही वक्त क्या इसलिए चुना कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका में थे, और वे और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, दोनों दक्षिण चीन सागर की बाबत बगैर नाम लिये चीन पर निशाना साध रहे थे? चीन अपनी महत्त्वाकांक्षी योजना ओबीओआर पर भारत और अमेरिका के रुख से भी खफा है। तो क्या चीन कहीं और की नाराजगी कहीं और निकाल रहा है! जो हो, तमाम विवाद के बावजूद भारत-चीन सीमा पर शांति बनी रही है। यों सीमा विवाद को स्थायी रूप से सुलझाने के लिए न जाने कितने दौर की वाताएं हो चुकी हैं, जिनका नतीजा सिफर रहा है, पर करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी सीमा पर, दशकों से हिंसा की कोई घटना न होना भी एक उपलब्धि है, और यह कायम रहनी चाहिए।

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