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संपादकीय: करार का मतलब

नरेंद्र मोदी सरकार के समय सैन्य साजो-सामान संबंधी कई अहम मसलों पर अमेरिकी सहयोग के प्रयास हुए हैं। ताजा करार उसी की एक कड़ी है।
Author August 31, 2016 23:09 pm
लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट के दौरान रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर

अमेरिका के साथ रक्षा साझेदारी संबंधी भारत के समझौतों से निस्संदेह दोनों देशों के बीच रिश्ते कुछ और मजबूत हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के वक्त वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि भारत हमारा महत्त्वपूर्ण सामरिक साझीदार है। उसी वक्त दोनों देशों की सेनाओं के एक-दूसरे के ठिकानों और सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर समझौते की पहल तेज हुई थी। हालांकि इन समझौतों की रूपरेखा यूपीए सरकार के समय ही तैयार हो गई थी, पर इस दिशा में आगे बढ़ने को लेकर हिचक बनी हुई थी। नरेंद्र मोदी सरकार ने भी इस करार तक पहुंचने में दो साल लगा दिए। इसकी वजह यही थी कि अमेरिका के साथ सामरिक रिश्ते मजबूत करने से दूसरे देशों के साथ संबंधों पर बुरा असर पड़ने की आशंका बनी हुई थी। भारत लंबे समय तक अमेरिका की सामरिक नीतियों का विरोधी रहा है। मगर पिछले कुछ सालों से जिस तरह चीन का दबदबा बढ़ रहा है और वह अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत जब-तब भारत को आंख दिखाने लगा है, उसमें अमेरिका से नजदीकी फायदेमंद मानी जाने लगी है। नरेंद्र मोदी सरकार के समय सैन्य साजो-सामान संबंधी कई अहम मसलों पर अमेरिकी सहयोग के प्रयास हुए हैं। ताजा करार उसी की एक कड़ी है।

इस करार के तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के ठिकानों और साजो-सामान का इस्तेमाल कर सकेंगी। यह केवल संयुक्त अभ्यास, उपकरणों की मरम्मत और आपूर्ति को सुचारु बनाने के मकसद से किया गया समझौता है। दोनों देश अपने ठिकाने बनाने के लिए किसी की जमीन का इस्तेमाल नहीं करेंगे। माना जा रहा है कि इस समझौते से भारतीय सेना को साझा अभ्यास और तकनीकी उपयोग से दक्षता हासिल होगी। हालांकि इस समझौते से केवल भारत को लाभ नहीं मिलने वाला। अमेरिका को भी दक्षिण एशिया में अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिलेगी। हिंद महासागर में भारत की महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी है, जहां अमेरिका को इस समझौते के तहत अपनी सेनाएं उतारने, उन्हें अभ्यास कराने, ठहराने की जगह मिल जाएगी और वह चीन पर आसानी से नजर रख सकेगा। अभी तक इस मामले में उसे पाकिस्तान से मदद मिलती रही है, पर हिंद महासागर में पाकिस्तान की हिस्सेदारी बहुत कम है, इसलिए अमेरिका को मनचाही ताकत नहीं मिल पा रही थी।

माना जा रहा है कि हिंद महासागर में और भारत के दूसरे सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी आवाजाही से चीन की चिंता बढ़ेगी। निस्संदेह इससे जापान, विएतनाम और आस्ट्रेलिया को भी राहत महसूस होगी, क्योंकि वे चीन की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इस समझौते के साथ ही अमेरिका ने आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए संयुक्त रणनीति बनाने संबंधी समझौते की जरूरत रेखांकित की है। जल्दी ही इस दिशा में करार की उम्मीद जताई जा रही है। इससे पाकिस्तान की पेशानी पर बल पड़ना स्वाभाविक है। मगर चीन ने भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी समझौते को बहुत अहमियत नहीं दी है। एक चिंता रूस को लेकर हो सकती है कि भारत के अमेरिकी गठबंधन में शामिल होने से वह नाराज हो सकता है। मगर उसे मनाना इसलिए मुश्किल नहीं माना जा रहा कि भारत और रूस रक्षा संबंधी अनेक परियोजनाओं पर संयुक्त रूप से काम कर रहे हैं। अमेरिका के साथ हुए ताजा समझौतों का भारत को लाभ सही मायने में तभी मिल सकेगा, जब अमेरिका इसे केवल सामरिक साजो-सामान का बड़ा बाजार समझ कर इस्तेमाल न करे।

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