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साझेदारी के रास्ते

भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन को भारत के सबसे महत्त्वाकांक्षी कूटनीतिक आयोजनों में एक माना जाएगा। यों भारत और अफ्रीका की इस तरह की साझा शिखर बैठक की शुरुआत यूपीए सरकार..

Author नई दिल्ली | Published on: October 30, 2015 12:02 AM

भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन को भारत के सबसे महत्त्वाकांक्षी कूटनीतिक आयोजनों में एक माना जाएगा। यों भारत और अफ्रीका की इस तरह की साझा शिखर बैठक की शुरुआत यूपीए सरकार के समय हुई थी। पहला सम्मेलन 2008 में दिल्ली में हुआ था। दूसरा सम्मेलन 2011 में इथियोपिया की राजधानी आदिस अबाबा में। पर तीसरे यानी दिल्ली में हुए ताजा सम्मेलन की तुलना में पहले के दो सम्मेलन बहुत छोटे थे; उनमें चुनिंदा अफ्रीकी देशों ने ही हिस्सा लिया था। यूपीए सरकार की पहल की देखादेखी अमेरिका, जापान और चीन ने भी वैसे सम्मेलन आयोजित किए, पर उनमें सभी अफ्रीकी देशों को न्योता दिया गया। मोदी सरकार ने भी इसी तर्ज पर तीसरे सम्मेलन में सभी अफ्रीकी देशों को आमंत्रित किया। ऐसे सम्मेलनों को अफ्रीका में अपना प्रभाव बढ़ाने की दुनिया की बड़ी शक्तियों की कवायद और प्रतिद्वंद्विता के तौर पर भी देखा जाता है। चीन इसमें सबसे आगे है।

पिछले डेढ़ दशक से अफ्रीका महाद्वीप में उसकी सक्रियता बढ़ती गई है। राजमार्गों, बंदरगाहों, बड़ी इमारतों और रेलसेवा से लेकर ढेर सारी बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में चीन की मौजूदगी तमाम अफ्रीकी देशों में दिखती है। दूसरी ओर, अफ्रीका के खनिज भंडार का दोहन करने में भी चीन ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। भारत इस मामले में चीन की बराबरी नहीं कर सकता। फिर, भारत जानता है कि अपनी कूटनीति को आगे बढ़ाने के साथ-साथ अफ्रीकी हितों का भी उतना ही खयाल रखना होगा, वरना देर-सबेर उलटी प्रतिक्रिया भी हो सकती है। तीसरा भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन आपसी सहयोग बढ़ाने, आतंकवाद से मिल कर मुकाबला करने और संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तावित सुधार पर केंद्रित रहा। अफ्रीकी नेताओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात और इस अवसर पर हुए भाषणों में संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में सुधार की जरूरत सभी ने रेखांकित की।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बने संयुक्त राष्ट्र का बुनियादी स्वरूप अब भी वही है जो स्थापना केसमय था; स्वाधीनता मिलने के साथ सदस्य-देशों की संख्या अलबत्ता बढ़ गई। संयुक्त राष्ट्र का सबसे ताकतवर हिस्सा सुरक्षा परिषद है, जो राष्ट्रों के आपसी तनाव और विश्व शांति के मसलों पर पहलकदमी करती है। विकासशील देश सोचते हैं कि सुरक्षा परिषद का विस्तार होगा तो उनकी भूमिका बढ़ेगी। लिहाजा, इस मामले में भारत और अफ्रीका की एक राय होना स्वाभाविक है। समस्या यह है कि किस अफ्रीकी देश को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का दावेदार माना जाए, इसे लेकर अफ्रीका में सहमति बन पाना मुश्किल है। फिर, बहुत-से अफ्रीकी देशों के अपने पड़ोसियों से संबंध तनावपूर्ण हैं। इसलिए आंतरिक मामलों में तटस्थता की अपनी नीति को भारत को हमेशा ध्यान में रखना होगा, और इस सजगता के साथ ही अफ्रीका में अपनी पहुंच बढ़ानी होगी।

अफ्रीका के कई देश आतंकवाद से पीड़ित हैं। इसलिए उन्होंने आतंकवाद का मसला उठाया तो यह महज कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी। बहुत सारे अफ्रीकी देश चिकित्सा, शिक्षा, कृषि विकास, संचार आदि तमाम क्षेत्रों में भारत के अनुभवों और सहयोग का लाभ उठाना चाहते हैं। भारत ने कई अफ्रीकी देशों को रियायती दरों पर कर्ज दे रखा है। तीसरे शिखर सम्मेलन के मौके पर भारत ने इस सहायता में और इजाफा करने की घोषणा की है। अफ्रीका के कोई चालीस देशों में उसने किसी न किसी ढांचागत परियोजना को क्रियान्वित किया है। उपनिवेशवाद और रंगभेद के विरोध ने दोनों के बीच एक समय वैचारिक पुल का काम किया था। नजदीकी बढ़ाने की नई कोशिशों में सरोकारों की यह विरासत भुलाई नहीं जानी चाहिए।

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