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संपादकीय: किसान की सुध

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के तहत बेशक राज्य सरकारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य चुकाने में मदद मिलेगी, पर इससे भी किसानों को कितना लाभ मिलेगा, कहना मुश्किल है। फसलों की सिंचाई, खाद, बीज, कीटनाशक आदि पर लागत इतनी बढ़ गई है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने के बावजूद कई बार किसानों को मुनाफा नहीं हो पाता।

Author September 14, 2018 1:45 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो सोर्स- पीटीआई)

फसलों की उचित कीमत न मिल पाने की वजह से किसानों के सामने अक्सर संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे में वे न तो बैंकों से लिया कर्ज समय पर चुका पाते हैं और न अगली फसल की तैयारी ठीक से कर पाते हैं। इस समस्या से पार पाने के लिए सरकार ने पिछले दिनों कुछ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उत्साहजनक वृद्धि की। मगर कई बार बाजार में फसल की मांग घटने पर उनकी कीमतों में गिरावट आ जाती है। वैसे में सरकारों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का भुगतान करना बड़ा आर्थिक बोझ साबित होता है। ऐसी समस्या से पार पाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण नीति को मंजूरी दी है, जिसके तहत अगले दो वित्तीय वर्षों के लिए पंद्रह हजार तिरपन करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इसके तहत तीन प्रकार की योजनाएं चलाई गई हैं। जब बाजार में फसल की कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम हो, तो राज्य सरकारें इन योजनाओं में से किसी एक का चुनाव कर किसानों को भुगतान कर सकती हैं। इस नीति से किसानों को राहत मिलने की उम्मीद की जा रही है।

कहा जा रहा है कि सरकार ने इस नीति की घोषणा चार राज्यों में होने वाले विधासभा और अगले आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए की है। माना जा रहा है कि इससे किसानों में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी। हालांकि सरकार किसानों की आमदनी दोगुनी करने का संकल्प लगातार दोहराती रही है और उसका दावा है कि इस दिशा में वह काफी हद तक कामयाब भी हुई है। अब केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा है कि अगले चार सालों में किसानों की आय दोगुनी करने, बाजार संरचना को मजबूत करने, पैदावार में वृद्धि और खेती की लागत कम करने के लक्ष्य तक पहुंचा जा सकेगा। फसल बीमा योजना, कृषि ऋण में आसानी और बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसे कदम उठा कर सरकार किसानों और किसानी की दशा सुधारने का प्रयास कर रही है। पर हकीकत यह है कि खेती से किसानों का बहुत मुश्किल से गुजारा हो पा रहा है। बहुत सारे किसान मजबूरी में खेती से जुड़े हुए हैं। गांवों से शहरों की तरफ पलायन घट नहीं रहा, इसलिए कि खेती रोजगार का विकल्प नहीं बन पा रही। इसकी वजह साफ है कि तमाम प्रयासों के बावजूद खेती घाटे का सौदा बनी हुई है।

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के तहत बेशक राज्य सरकारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य चुकाने में मदद मिलेगी, पर इससे भी किसानों को कितना लाभ मिलेगा, कहना मुश्किल है। फसलों की सिंचाई, खाद, बीज, कीटनाशक आदि पर लागत इतनी बढ़ गई है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने के बावजूद कई बार किसानों को मुनाफा नहीं हो पाता। धान के समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोतरी की गई, पर सबसे अधिक लागत इसी फसल को उगाने पर आती है, जो कई बार न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक बैठती है। फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य सभी फसलों पर लागू नहीं है, इसलिए इनसे इतर फसलें उगाने वाले किसान बाजार की मर्जी पर निर्भर रहते हैं। इसके अलावा सबसे अधिक नुकसान किसानों को कच्ची फसलों यानी साग-सब्जियों और फलों पर उठाना पड़ता है, जिनके भंडारण और विपणन का कोई व्यावहारिक तंत्र अभी तक विकसित नहीं हो पाया है। जब तक इन पक्षों पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक किसानों की दशा में अपेक्षित सुधार का दावा करना मुश्किल है।

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