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संपादकीय: मदद और निहितार्थ

भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों की वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच जो कॉमकासा (कम्युनिकेशंस, कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) संधि हुई है, उसके तहत भारत को रक्षा क्षेत्र में काफी कुछ नया हासिल होने जा रहा है।

Author September 8, 2018 1:50 AM
संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री माइकल आर पोंपिओ और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण।

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में रिश्तों की जो नई शुरुआत हुई है, वह दोनों देशों के लिए मील का एक पत्थर है। यह बात इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि रक्षा क्षेत्र में भारत दशकों तक पूरी तरह से रूस पर निर्भर रहा है। लेकिन अब बदलते वैश्विक परिदृश्य और समीकरणों में रिश्तों की यह धुरी बदली है और अमेरिका को नया रक्षा सहयोगी बनाने की दिशा में भारत ने कदम बढ़ाए हैं। एक लिहाज से यह अच्छा इसलिए भी माना जाना चाहिए कि हम अब किसी एक देश या ताकत पर आश्रित नहीं रहेंगे, बल्कि जरूरत के मुताबिक अपने सैन्य बलों को अत्याधुनिक बनाने का फैसला कर सकेंगे। इसके अलावा वैश्विक महाशक्तियों के साथ रिश्तों में एक संतुलन बनेगा और भारत पर किसी का मोहरा बनने का ठप्पा भी नहीं लगेगा। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसमें न सिर्फ भारत के बल्कि अमेरिका के भी दूरगामी हित शामिल हैं। दस साल पहले तक अमेरिका के साथ रक्षा व्यापार मामूली था, लेकिन आज भारत उससे दस अरब डॉलर से ज्यादा के उपकरण खरीद रहा है और आने वाले दिनों में इसमें तेजी से इजाफा होगा।

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भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों की वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच जो कॉमकासा (कम्युनिकेशंस, कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) संधि हुई है, उसके तहत भारत को रक्षा क्षेत्र में काफी कुछ नया हासिल होने जा रहा है। इसके तहत अमेरिका भारत को सभी गोपनीय सुरक्षा तकनीक देगा, सेना को अत्याधुनिक संचार प्रणाली से लैस करने लिए तकनीक मिलेगी और सी-17 व सी-130 हरक्यूलिस जैसे विमान भारत में बनने का रास्ता खुलेगा। इससे भी बड़ी बात यह कि अमेरिका सारे संवेदनशील डाटा भारत को मुहैया कराएगा, जो सुरक्षा के लिहाज से भारत के लिए जरूरी होंगे। अमेरिका ने वादा किया है कि चीन और पाकिस्तान की सैन्य तैयारियों को लेकर भी वह भारत को सूचनाएं देता रहेगा। इन दोनों देशों की गतिविधियों की निगरानी के लिए अमेरिका ड्रोन तकनीक भी देगा। इस करार से कुल मिला कर ऐसा संदेश जाता है कि जैसे भारत की झोली भरने को अमेरिका तैयार बैठा था।

लेकिन सवाल है कि अमेरिका भारत के प्रति इतनी दरियादिली दिखा क्यों रहा है। ऐसी क्या बात है कि भारत पर ट्रंप प्रशासन इतना मेहरबान हुआ है? जाहिर है, इसमें उसके हित और स्वार्थ कहीं ज्यादा बड़े हैं। भारत को चीन और पाकिस्तान का खौफ दिखा कर भारत के रक्षा क्षेत्र में पैर पसारने की यह अमेरिकी कवायद दूरगामी मतलब लिए हुए है। हमारी जरूरत यह है कि हमें चीन और पाकिस्तान को यह अहसास कराते रहना है कि सैन्य ताकत के मुकाबले में हम उनसे कहीं पीछे नहीं रहेंगे और हर स्थिति का सामना करने को तैयार हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में एक सैन्य ताकत के रूप में दबदबा बनेगा। लेकिन अमेरिका इस बहाने चीन से निपटने की दूरगामी रणनीति पर चल रहा है। वह भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की मदद से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में अपना दबदबा कायम करना चाह रहा है। इस बारे में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया केबीच साल भर के दौरान दो बार बैठकें हो चुकी हैं और इसे नए गठजोड़ के रूप में देखा जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में भारत को भारी मदद की आड़ में ईरान से दूर करने की रीति पर भी अमेरिका काम कर रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो अमेरिका दशकों से पाकिस्तान को पालता-पोसता रहा है, जिस पर उसका वरदहस्त रहा है और जो आज भी बना हुआ है, वह भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में कैसे और कितना बड़ा सहयोगी साबित होगा?

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