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सराहनीय कदम

महिला पुलिस थानों की स्थापना का हरियाणा सरकार का फैसला स्त्री-सुरक्षा और स्त्री-सशक्तीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह उस राज्य में हुआ है जो देश में पुरुषों के..

Author नई दिल्ली | August 31, 2015 2:47 PM

महिला पुलिस थानों की स्थापना का हरियाणा सरकार का फैसला स्त्री-सुरक्षा और स्त्री-सशक्तीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह उस राज्य में हुआ है जो देश में पुरुषों के बरक्स महिलाओं के सबसे खराब अनुपात के लिए जाना जाता है। फिर, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक महिलाओं की प्रति एक लाख आबादी पर उनके खिलाफ अपराध की दर पिछले साल सबसे ज्यादा हरियाणा में दर्ज हुई। लिहाजा, हरियाणा सरकार की यह पहल राज्य की छवि को बदलने की एक गंभीर कोशिश है। इसके तहत राज्य के सभी इक्कीस जिलों में एक ऐसा थाना होगा जहां महिला पुलिसकर्मी ही तैनात होंगी। कुछ पुरुष पुलिसकर्मी भी होंगे, गिरफ्तारी और छापा डालने आदि में मदद के लिए, पर थाने का नियंत्रण, संचालन और सारे अहम निर्णय महिलाएं ही करेंगी।

राज्य सरकार के इस कदम की उपयोगिता सहज ही समझी जा सकती है। यह आम अनुभव की बात है कि पीड़ित महिला, पुरुष पुलिसकर्मी के सामने अपनी शिकायत और व्यथा आसानी से बयान नहीं कर पाती है। यौन अपराध के मामलों में तो यह बात खासकर लागू होती है। अगर पीड़िता का साबका महिला पुलिसकर्मी से हो, तो न्याय की पहली सीढ़ी चढ़ना उसके लिए सरल हो जाता है। नए खुलने वाले ये थाने बलात्कार, छेड़खानी, घरेलू हिंसा, दहेज के नाम पर होने वाले उत्पीड़न और हत्या के मामलों से निपटेंगे।

यह संभव है कि महिला पुलिस थाने खुलने से कुछ समय बाद स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों की शिकायतों में बढ़ोतरी नजर आए, क्योंकि अब पीड़ित पक्ष के लिए शिकायत दर्ज कराना आसान होगा। पर हमें आंकड़ों से क्यों घबराना चाहिए, अगर मकसद आपराधिक मामलों को छिपाना या दबाना नहीं बल्कि उन पर काबू पाना है। किसी भी राज्य सरकार या उसके पुलिस महकमे के कामकाज का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने आपराधिक मामले दर्ज हुए, क्योंकि वैसे में घटनाओं पर परदा डालने की प्रवृत्ति पनपती है। बल्कि कसौटी यह होनी चाहिए कि कितने मामलों को तर्कसंगत परिणति तक पहुंचाया गया। महिला थानों के चलते पुलिसबल में महिलाओं का अनुपात बढ़ेगा; फिलहाल भारत में पुलिसबल में महिला भागीदारी महज छह फीसद है।

देश में सबसे पहले महिला थाने की पहल 1973 में केरल के कोझीकोड में हुई थी; तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसका उद्घाटन किया था। फिर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक ने भी इस प्रयोग को अपनाया। आज देश भर में पांच सौ से कुछ अधिक महिला थाने हैं। इनके चलते स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों की एफआइआर दर्ज होने में तो सुविधा हुई, फलस्वरूप कई जगह शिकायतों के आंकड़े भी बढ़े, पर अपराध कम हुए यह दावा कर पाना मुश्किल है। गौरतलब है कि सजा की सबसे कम दर बलात्कार के मामलों में रहती है। दरअसल, आपराधिक मामलों को एक समय-सीमा में तार्किक परिणति तक पहुंचाए बगैर अपराधों पर काबू पाने का मकसद पूरा नहीं हो सकता। और इसके लिए जरूरी है कि स्त्री-सुरक्षा और स्त्री-सशक्तीकरण के नजरिए से न्यायिक सुधार के भी कदम उठाए जाएं।

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