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गऊ बसेरा

जिन गोपालकों के पास अपनी गायों को रखने की जगह नहीं है, उन्हें खुले में छोड़ देते हैं, वे उन्हें इन हॉस्टलों में दाखिला दिला सकते हैं।

Author July 31, 2017 04:39 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

गऊ बसेरा

गायों की देखरेख के लिए हरियाणा सरकार एक अभिनव प्रयोग करने जा रही है। राज्य के गौ सेवा आयोग ने गायों के लिए हॉस्टल बनाने का प्रस्ताव तैयार किया है। जिन गोपालकों के पास अपनी गायों को रखने की जगह नहीं है, उन्हें खुले में छोड़ देते हैं, वे उन्हें इन हॉस्टलों में दाखिला दिला सकते हैं। यह योजना गोशालाओं से अलग है। हॉस्टल में गायों को रखने का शुल्क गोपालकों से वसूला जाएगा और वे अपनी गायों का दूध निकालने को स्वतंत्र होंगे। खासकर शहरी क्षेत्रों में ऐसे अनेक गोपालक हैं, जो दूध का कारोबार तो करते हैं, पर उनके पास गायों को रखने की पर्याप्त जगह नहीं है। वे उनका दूध निकालने के बाद सड़कों पर विचरने को छोड़ देते हैं। इस तरह न सिर्फ सड़कों पर गंदगी फैलती है, आवागमन बाधित होता है, बल्कि कई बार वाहनों आदि की चपेट में आकर गाएं अपंग हो जाती या दम तोड़ देती हैं। हॉस्टलों में गाएं रख कर गोपालक उनकी सुरक्षा को लेकर निश्चिंत हो सकते हैं। अभी यह योजना हरियाणा के दो शहरों में शुरू करने का प्रस्ताव है। इस योजना की कामयाबी को देखते हुए विस्तार पर विचार किया जाएगा।

भाजपा शासित राज्य सरकारें गोरक्षा को प्रतिबद्ध दिखती हैं। गोरक्षा के नाम पर गोरक्षक जगह-जगह उग्र रूप अख्तियार करते देखे जाते हैं, जिसके कारण राज्य और केंद्र सरकार तक को कई बार शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है। ऐसे में गोरक्षा के बेहतर और व्यावहारिक उपाय आजमाने पर जोर दिया जा रहा है। शहरों में गोशालाएं हैं, मगर उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं। उनमें अव्यवस्था के चलते गायों के बड़े पैमाने पर मरने की शिकायतें भी मिलती रही हैं। ऐसे में गोरक्षकों से पूछा जाता रहा है कि बेसहारा और आवारा भटकने वाली गायों की रक्षा के उपाय क्यों नहीं किए जाते। गोरक्षा का मतलब सिर्फ गोवध रोकना नहीं, बल्कि गोवंश की संपूर्ण सुरक्षा के उपाय होने चाहिए। ऐसे में अगर हरियाणा गौ सेवा आयोग ने गायों को बेसहारा भटकने और सड़कों के जोखिम से बचाने के लिए हॉस्टल बनाने का प्रारूप तैयार किया है, तो निस्संदेह सभी राज्य सरकारों के लिए यह प्रेरणा का विषय हो सकता है।

बड़ी संख्या में किसानों ने पशुपालन इसलिए छोड़ दिया है कि यह खासा खर्चीला काम हो गया है। जब तक गाएं दूध देती हैं, तब तक उनका खर्च उठाना उनके लिए मुश्किल नहीं होता, पर दूध देना बंद करते ही उनका खर्च भारी लगने लगता है। फिर कई ऐसे लोग हैं जो दूध का कारोबार तो करते हैं, पर उनके पास पर्याप्त जगह नहीं होती। किराए पर जगह लेना खासा महंगा पड़ता है। फिर ऐसी गायों को रखना, जो दूध नहीं देतीं, दोहरे खर्च का बोझ बन जाता है। इसलिए अगर गायों के लिए हॉस्टल बनता है, तो कई गोपालक उनमें अपनी दुधारू गाएं बेशक रखने से कतराएं, पर दूध देना बंद कर चुकी गायों को रखने को प्रोत्साहित होंगे। गऊ बसेरे का प्रस्ताव निस्संदेह उत्साहजनक कहा जा सकता है, पर इसकी कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि उनमें गायों की देखभाल को लेकर कितनी बेहतर व्यवस्था होती है। समय पर चारा-पानी देने, बीमारी की अवस्था में उपचार आदि को लेकर कितनी मुस्तैदी बरती जाती है। जैसा कि सरकारी योजनाओं में लापरवाही का भाव देखा जाता है, गऊ बसेरे में उसकी मौजूदगी पूरी योजना पर पानी फेर सकती है। इस तरह गौ सेवा पर सवाल और गाढ़े होंगे।

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