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जनसत्ता संपादकीय : जीएसटी की राह

वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी अधिनियम के संसद में पारित होने का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है। जीएसटी को लेकर सभी राज्यों के वित्तमंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति की कोलकाता में हुई बैठक में इसके संकेत मिले।

Author नई दिल्ली | June 16, 2016 3:27 AM
केंद्र की जीएसटी लागू करने की हड़बड़ी समझी जा सकती है। दरअसल, सरकार का जोर विकास पर है।

वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी अधिनियम के संसद में पारित होने का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है। जीएसटी को लेकर सभी राज्यों के वित्तमंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति की कोलकाता में हुई बैठक में इसके संकेत मिले। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बताया कि तमिलनाडु को छोड़ कर सभी राज्य इसे लागू करने के पक्ष में हैं। इसके लागू होने से राज्यों को होने वाले राजस्व घाटे की भरपाई को लेकर तमिलनाडु की कुछ शर्तें हैं, जिन्हें मान लेना शायद केंद्र के लिए मुश्किल न हो। कांग्रेस का रुख भी इस मामले में लचीला नजर आ रहा है। सरकार संसद के मानसून सत्र में यह विधेयक सदन के सामने रखना और अगले वित्त वर्ष से लागू कर देना चाहती है।

हालांकि इस विधेयक का मसौदा यूपीए सरकार के समय ही बना था और राज्य सरकारों के साथ कई चरण की बातचीत भी हुई थी, मगर गुजरात जैसे कुछ राज्यों के अतिरिक्त कर प्रावधान की मांग के चलते इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका था। जब नरेंद्र मोदी सरकार ने जीएसटी विधेयक में संशोधन करके नए सिरे से संसद के समक्ष रखा तो उस पर काफी आपत्ति दर्ज की गई। उसमें से एक आपत्ति यह थी कि जब जीएसटी लागू होने के बाद केंद्र सभी राज्यों को उनके राजस्व भरपाई का जिम्मा उठा रहा है तो उन्हें अतिरिक्त दो प्रतिशत अंतरराज्यीय कर लगाने की छूट क्यों मिलनी चाहिए। इसके अलावा कई राज्यों ने कुछ और संशोधनों का सुझाव दिया था। केंद्र ने उन सुझावों के अनुरूप जीएसटी विधेयक में संशोधन किया है या नहीं, अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए अड़चनें पूरी तरह दूर हुई नजर नहीं आ रहीं।

केंद्र की जीएसटी लागू करने की हड़बड़ी समझी जा सकती है। दरअसल, सरकार का जोर विकास पर है। मगर इसमें इसलिए भी गति नहीं मिल पा रही है कि हर राज्य की अपनी कर नीति होने के कारण औद्योगिक समूहों को उत्पादन और वस्तुओं की बिक्री पर काफी कर चुकाना पड़ता है। सेवा कर तो सभी राज्यों में समान है, पर वस्तुओं पर लगने वाला कर राज्य अपने ढंग से निर्धारित करते हैं। जीएसटी के बाद सभी राज्यों में वस्तुओं पर समान कर लगने लगेगा। इससे उत्पादकों और विक्रेताओं को काफी सहूलियत होगी। मगर कई राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों की मांग है कि जीएसटी की दर स्थिर और इसकी समय सीमा तय की जाए। इसे अठारह प्रतिशत तक रखने की सिफारिश है। मगर केंद्र सरकार इसे लचीला बनाए रखने के पक्ष में है। इसी प्रकार राज्यों को अतिरिक्त एक प्रतिशत अंतरराज्यीय कर लगाने का अधिकार दिया गया है।

हालांकि आॅनलाइन खरीद-बिक्री के मामले में पूरे देश में समान कर लगाने और सिर्फ वहीं कर वसूले जाने का प्रस्ताव है, जहां पहली बार वित्तीय लेन-देन की जाएगी। मगर राज्यों को एक प्रतिशत अतिरिक्त कर वसूलने के मामले में इस बात की परवाह नहीं की गई है। यानी इससे अगर कोई कंपनी या औद्योगिक इकाई अपनी ही एक इकाई से दूसरी इकाई तक एक ही उत्पाद को विभिन्न चरण से गुजारते हुए लाती-ले जाती है तो उसे बार-बार राज्यों द्वारा निर्धारित अतिरिक्त कर का भुगतान करना पड़ेगा। इससे वस्तुओं के सस्ती होने की उम्मीद धुंधली ही बनी रहेगी। ऐसे में केंद्र को जीएसटी विधेयक पारित कराने से पहले इन तमाम पहलुओं पर गंभीरता से विचार करने और सारी उलझनों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।

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