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यूनान का दुश्चक्र

पूरी दुनिया के माथे पर यूनान के वित्तीय संकट ने चिंता की लकीरें खींच दी हैं। तमाम देशों के शेयर बाजारों पर इसका असर दिखा है, भारत में भी। यूनान का आर्थिक संकट छह साल पुराना है। यही नहीं, उसके तार और भी पहले के बरसों से जुड़े हैं। लेकिन इन दिनों उसकी मुसीबत चरम […]
Author July 1, 2015 17:23 pm

पूरी दुनिया के माथे पर यूनान के वित्तीय संकट ने चिंता की लकीरें खींच दी हैं। तमाम देशों के शेयर बाजारों पर इसका असर दिखा है, भारत में भी। यूनान का आर्थिक संकट छह साल पुराना है। यही नहीं, उसके तार और भी पहले के बरसों से जुड़े हैं। लेकिन इन दिनों उसकी मुसीबत चरम पर है। इस देश की मौजूदा हालत यह है कि अपने लोगों को वेतन और पेंशन देना उसके लिए एक बड़ी समस्या हो गई है। पच्चीस फीसद लोग बेरोजगार हैं। ऊपर से वह बाहरी कर्जों से बुरी तरह ग्रसित है, ये कर्ज उसके लिए दलदल बन गए हैं।

एक किस्त चुकाने के लिए जो शर्तें स्वीकार करनी पड़ती हैं, वे कुछ समय बाद उसे और असहाय बना देती हैं। विडंबना है कि यह स्थिति एशिया या अफ्रीका के किसी गरीब देश की नहीं है। यूनान की गिनती विकसित देशों में होती रही है। उसकी अर्थव्यवस्था तीन चौथाई से ज्यादा सेवा क्षेत्र और सोलह फीसद उद्योगों पर निर्भर है। पर्यटन भी यूनानी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार रहा है। लेकिन आधुनिक आर्थिक प्रगति के इन कारकों के बावजूद यूनान इस कदर वित्तीय संकट से घिर गया है कि उससे निकलने का कोई रास्ता उसे सूझ नहीं रहा। उसकी मदद करते आ रहे यूरोपीय देश और वैश्विक वित्तीय संस्थान भी सोच नहीं पा रहे कि यूनान को इस संकट से बाहर कैसे निकालें।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता केवल यूनान को लेकर नहीं है, खुद अपनी भी है। उन्हें डर है कि अगर यूनान नहीं संभला, तो गाज उन पर भी गिर सकती है। यूरोपीय संघ ने 2001 में एकल मुद्रा अपनाई थी। यूनान भी इसमें शामिल हुआ। यूरोपीय संघ को यह अंदेशा सता रहा है कि अगर यूनान दिवालिया घोषित हो गया, तो यूरो के भविष्य पर क्या असर होगा। गौरतलब है कि यूनान को तीस जून तक अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से लिया 1.6 अरब यूरो का कर्ज चुकाना था। पर वह इसमें नाकाम रहा। उस पर यूरोपीय केंद्रीय बैंक और यूरोप के अलग-अलग देशों से लिए हुए कर्जों का भी भारी बोझ है।

राहत के लिए यूरोपीय संघ या केंद्रीय यूरोपीय बैंक के साथ बातचीत का फिलहाल कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है। अगर यूनान को फौरी तौर पर कुछ राहत मिल भी जाती है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि देर-सबेर इसे उसकी क्या कीमत चुकानी होगी। ऐसी हर सहायता या कर्ज के साथ प्रशासनिक खर्चों से लेकर वेतन-भत्तों में कटौती जैसी ढेरों शर्तें जुड़ी रही हैं। ऐसी शर्तें न मानने के वादे पर ही वामपंथी रुझान की सिरीजा पार्टी सत्ता में आई है। कुछ लोग यूनान के मौजूदा संकट को सिरीजा पार्टी के विचारधारात्मक आग्रहों से भी जोड़ कर देखते हैं। लेकिन जब वह सत्ता में नहीं थी, तब भी, विश्वव्यापी मंदी के साल भर बाद यूनान की ऐसी ही हालत थी।

दरअसल, यह देश अपनी शाहखर्ची, भ्रष्टाचार और वित्तीय स्थिति के खोखले दावों की सजा भुगत रहा है। वर्ष 1994 में आए भूकम्प ने यूनान में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। उसे करीब पचास हजार मकान सरकारी खर्चे से बनाने पड़े। इससे वित्तीय हालत खस्ता होने के बावजूद उसने ओलंपिक के आयोजन की दावेदारी पेश की और 2004 में ओलंपिक की मेजबानी में बेतहाशा पैसा बहाया। अपनी वित्तीय मजबूती दर्शाने के लिए सरकारी खातों में हेराफेरी करके बढ़-चढ़ कर दावे किए। लेकिन जैसे ही झूठ उजागर हुआ, रेटिंग एजेंसियों ने यूनानी अर्थव्यवस्था को नकारात्मक श्रेणी में डाल दिया। तब से कर्ज, और ज्यादा कर्ज का सिलसिला चल रहा है और यह उसके लिए अंतहीन जाल बन गया है। यूनान के यूरो से जुड़े होने के कारण यह यूरोजोन या यूरोपीय संघ का भी संकट है और एक मायने में वैश्वीकरण का भी।

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