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जनसत्ता संपादकीय : दवा की कीमत

भारत में स्वास्थ्य के मोर्चे पर दयनीय हालात के मद्देनजर दवाओं की कीमतों के मामले में ऐसे किसी फैसले को क्या उचित कहा जा सकता है!

Author नई दिल्ली | June 8, 2016 5:53 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे लोगों की तादाद बहुत बड़ी है, जो कई बार पैसे की कमी की वजह से बेहतर इलाज नहीं करा पाते और या तो बीमारी झेलते रहते हैं या फिर उनकी जान चली जाती है। इसके पीछे दवाओं की कीमतें एक बड़ी वजह है, जो कम आयवर्ग या कमजोर तबकों की पहुंच में नहीं होतीं। इसलिए समय-समय पर दवाओं की ऊंची कीमतों को लेकर काफी सवाल उठते रहे हैं। अब सरकार ने कैंसर, मधुमेह, विषाणु संक्रमण और उच्च रक्तचाप जैसी कई गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली छप्पन महत्त्वपूर्ण दवाओं की कीमतों की सीमा तय कर दी है।

यह फैसला अमल में आने के बाद इन दवाओं के मूल्य में लगभग पच्चीस फीसद तक की कमी आएगी। हालांकि नसों में दिए जाने वाले ग्लूकोज और सोडियम क्लोराइड के इंजेक्शनों की कीमतों में बढ़ोतरी की गई है। लेकिन छप्पन अहम दवाओं की कीमतें कम होने से निश्चित तौर पर लोगों को थोड़ी राहत मिलेगी। हमारे यहां बीमारियों के इलाज की स्थिति ऐसी है कि एक बड़ी आबादी के लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं होती। ज्यादातर डॉक्टर किसी भी बीमारी में कुछ खास कंपनियों की महंगी दवाएं लेने की सलाह देते हैं या फिर कई गैरजरूरी दवाएं भी लिख देते हैं। जबकि एक विकल्प जेनेरिक दवाओं का मौजूद है। लेकिन खुद सरकार भी जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता के लिए बहुत गंभीर नहीं दिखती। लगभग तीन साल पहले भारतीय चिकित्सा परिषद ने निर्देश जारी किया था कि डॉक्टर जहां तक संभव हो, मरीजों को जेनेरिक यानी सस्ती दवाएं लिखें। लेकिन शायद ही ऐसा देखा जाता है। इसके पीछे वजह सिर्फ यह होती है कि अपनी बनाई दवाएं लिखने के एवज में संबंधित कंपनियों की ओर से डॉक्टरों को कमीशन, उपहार और विदेश यात्रा की सुविधाएं मिलती हैं।

राष्ट्रीय औषधि मूल्य प्राधिकरण की ताजा अधिसूचना के मुताबिक अगर विनिर्माता कंपनियां उच्च कीमत सीमा की व्यवस्था का अनुपालन नहीं करती हैं तो उन्हें अतिरिक्त राशि ब्याज के साथ जमा करनी पड़ेगी। इसमें अच्छा यह है कि सरकार ने कुछ गंभीर बीमारियों के इलाज के आर्थिक पक्ष और इसके चलते प्रभावित लोगों के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए इन्हें नियंत्रण के दायरे में रखने का फैसला किया है। वरना आर्थिक सुधारों के नाम पर बाजार के मामले में जिस तरह की नीतियों की ओर सरकारों के कदम बढ़ रहे हैं, उसमें वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त कर देने को ही समस्या के हल के रूप में पेश किया जा रहा है।

मगर सवाल है कि भारत में स्वास्थ्य के मोर्चे पर दयनीय हालात के मद्देनजर दवाओं की कीमतों के मामले में ऐसे किसी फैसले को क्या उचित कहा जा सकता है! दरअसल, ताजा पहल इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि करीब डेढ़ साल पहले सरकार की ओर से एक सौ आठ दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण हटा लेने की खबरें आर्इं थीं, जिनमें टीबी, कैंसर जैसी बीमारियों की दवाएं शामिल थीं। इसके बाद इन दवाओं की कीमतों में बेलगाम बढ़ोतरी की आशंका जाहिर की गई थी। सवाल है कि नियंत्रण हटने के साथ ही कभी सौ और हजार रुपए में मिलने वाली दवाओं के हजार और लाख रुपए वसूले जाएं, तो ऐसी नीतियों का क्या हासिल होगा! फिलहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार के ताजा फैसले के बाद महंगी दवाओं की कीमतों में कुछ कमी आएगी।

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