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संपादकीय: नेक सलाह

आम आदमी पार्टी के अलावा खुद मुख्यमंत्री अफसरों पर सरकार को ठप करने का दोष मढ़ रहे हैं। जबकि नौकरशाही नियमानुसार काम करने का दावा कर रही है। हाल में मामला तब और बिगड़ गया जब दिल्ली विधानसभा की एक समिति ने मुख्य सचिव को जवाब तलब का नोटिस भेज दिया और मुख्य सचिव ने इस नोटिस के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

Author Updated: March 6, 2018 2:34 AM
उन्नीस फरवरी की रात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर हुई एक बैठक में मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से मारपीट की खबर सामने आई थी।

दिल्ली सरकार और नौकरशाही के बीच लंबे समय से जो गतिरोध बना हुआ है वह गंभीर चिंता का विषय है। इस तरह की घटनाएं हमारे नीति नियंताओं को कठघरे में खड़ा करती हैं। पिछले दिनों एक बैठक में मुख्य सचिव के साथ हाथापाई की घटना के बाद केजरीवाल सरकार और नौकरशाहों के बीच का टकराव अब ज्यादा गंभीर रूप ले चुका है। इससे जनता में जो गलत संदेश गया है वह यह कि सरकार ठप हो गई है, कहीं कोई काम नहीं हो रहा। मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों से लेकर नौकरशाह तक- सब पुलिस और अदालत के फेर में पड़े हैं। आम आदमी पार्टी के अलावा खुद मुख्यमंत्री अफसरों पर सरकार को ठप करने का दोष मढ़ रहे हैं। जबकि नौकरशाही नियमानुसार काम करने का दावा कर रही है। हाल में मामला तब और बिगड़ गया जब दिल्ली विधानसभा की एक समिति ने मुख्य सचिव को जवाब तलब का नोटिस भेज दिया और मुख्य सचिव ने इस नोटिस के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए पूरे प्रसंग पर खिन्नता जाहिर की। जजों का कहना था कि बेहतर होता दोनों पक्ष विवाद को न बढ़ाते और गुस्सा शांत करने की कोशिश करते, लेकिन कोई भी पक्ष शांत होने के बजाय मामले को बढ़ाने में ही अपनी बुद्धिमत्ता समझता रहा।

दिल्ली सरकार के रवैए से नाखुश अदालत ने कहा कि विधानसभा की संबंधित समिति ओर से जारी नोटिस आग में घी का काम करता है। मुख्य सचिव को अगर सम्मान नहीं मिलेगा तो काम कैसे होगा? आप उनकी इज्जत नहीं करेंगे तो चीजें कैसे काम करेंगी? क्या उन्हें बुलाने का और कोई तरीका नहीं था? केजरीवाल सरकार के पास इन सवालों का शायद ही कोई संतोषजनक जवाब हो! ऐसा नहीं है कि केजरीवाल सरकार और अफसरों के बीच टकराव कोई पहली बार हो रहा हो। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यहां तक कह चुके हैं कि उन्हें आइएएस अफसरों की जरूरत ही नहीं है, केंद्र सरकार चाहे तो अपने अफसरों को वापस बुला ले। लेकिन क्या बिना कार्यपालिका के, सरकार चलाई जा सकती है? फिर केजरीवाल इस तरह के बयान क्यों देते हैं? ऐसा लगता है कि इस तरह के बयान देकर वे यह जताना चाहते होंगे कि आइएएस अफसर केंद्र के इशारों पर चलते हैं और केंद्र उन्हें काम नहीं करने देना चाहता है। दूसरे, वे अफसरों के प्रति आम लोगों की नाराजगी को अपने पक्ष में भुनाना चाहते होंगे।

बहरहाल, इस तरह के कथन मुख्यमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति को शोभा नहीं देते। सरकार चलाने के दौरान राजनेताओं और अफसरों के बीच टकराव या मतभेद होना अलग बात है। लेकिन यह हिंसक या अपमानजनक शक्ल अख्तियार कर ले, तो यह वाकई गंभीर चिंता का विषय है। मंत्री, सांसदों, विधायकों के हाथों अफसरों के उत्पीड़न की घटनाएं सामने आती ही रहती हैं। बहुत लंबा वक्त नहीं गुजरा जब सहारनपुर में भाजपा सांसद की अगुआई में भीड़ ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के बंगले पर हमला कर दिया था। गोरखपुर में भाजपा के ही एक विधायक ने महिला आइपीएस अधिकारी को सरेआम अपमानित किया था। ऐसे और भी उदाहरण हैं। लेकिन दिल्ली में तो मर्यादा तार-तार करने में पूरी पार्टी और सरकार ही शामिल हो गई। क्या उम्मीद की जाए कि उच्च न्यायालय की टिप्पणी से वे सबक लेंगे!

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