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संपादकीय : गांधी की याद

पीटरमैरिट्जबर्ग में यह घटना हुई थी, पहले दर्जे का टिकट होने के बावजूद उन्हें यह कह कर ट्रेन से जबर्दस्ती उतार दिया गया कि वे पहले दर्जे में सफर नहीं कर सकते। इस घटना को व्यक्तिगत अपमान तक सीमित रख कर देखने के बजाय इसे उन्होंने सामुदायिक प्रश्न बना दिया।

Author June 9, 2018 03:24 am
राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (1869-1948) (फाइल फोटो)

दक्षिण अफ्रीका में समय-समय पर महात्मा गांधी की स्मृति में समारोह आयोजित होते रहे हैं। लेकिन इस बार एक घटना के सवा सौ साल पूरे होने पर गांधी को याद किया गया। यह घटना वही थी, जहां से गांधी के गांधी बनने की शुरुआत हुई। वह घटना मार्मिक और झकझोर देने वाली थी। उन घटना ने मोहनदास करमचंद गांधी नाम के बैरिस्टर को भीतर से हिला दिया और उनके मन में नस्ली भेदभाव के खिलाफ एक चिनगारी सुलगा दी थी। इस घटना के बाद नौजवान बैरिस्टर गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रह कर रंगभेद के खिलाफ संघर्ष करने का फैसला किया। इसके बाद दो दशक से भी कुछ ज्यादा समय तक गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में रहे और रंगभेद के खिलाफ लड़े। इसलिए दक्षिण अफ्रीका में गांधी को याद करते हुए उस घटना की एक सौ पच्चीसवीं जयंती मनाया जाना पूरी दुनिया के लिए एक संदेश भी है कि कैसे एक शख्स ने अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए अन्याय के खिलाफ संघर्ष की नींव रखी; कैसे सत्याग्रह का जन्म हुआ। सच तो यह है दक्षिण अफ्रीका ने ही गांधी को वह गांधी बनाया जिसे दुनिया जानती है। वहां बाईस साल रह कर उन्होंने सत्याग्रह के अहिंसक शस्त्र भी विकसित किए और शास्त्र भी।

पीटरमैरिट्जबर्ग में यह घटना हुई थी, पहले दर्जे का टिकट होने के बावजूद उन्हें यह कह कर ट्रेन से जबर्दस्ती उतार दिया गया कि वे पहले दर्जे में सफर नहीं कर सकते। इस घटना को व्यक्तिगत अपमान तक सीमित रख कर देखने के बजाय इसे उन्होंने सामुदायिक प्रश्न बना दिया। उस घटना एक सौ पच्चीसवां वर्ष मनाने के लिए, उचित ही, पीटरमैरिट्जबर्ग शहर को ही चुना गया, जो कि उस सफर के वक्त एक छोटा-सा गांव था। समारोह में नेलसन मंडेला और गांधी दोनों को याद किया गया। मंडेला दक्षिण अफ्रीका की आजादी की लड़ाई के महानायक हैं। दक्षिण अफ्रीका के आजाद होने के बाद वे राष्ट्रपति रहे। वहां के लोग उन्हीं में गांधी को देखते हैं। समारोह में भारत, इथोपिया, केन्या, नाइजीरिया, तंजानिया, जांबिया, मिस्र, मलावी, सेशल्स और मोजांबिक से आए युवा प्रतिनिधियों ने दक्षिण अफ्रीका के युवाओं के साथ गांधी के सत्याग्रह, अहिंसा और सर्वोदय के सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर चर्चा की। इस कॉन्फ्रेंस का लब्बोलुआब था कि दुनिया में मानवता के लिए जो खतरे पैदा हो रहे हैं, उनसे गांधीवादी तरीकों से निपटने के बारे में विचार हो।

महात्मा गांधी को दुनिया भर में अहिंसा के पुजारी के तौर पर देखा जाता है। यों अहिंसा का मूल्य गांधी के बहुत पहले से चला आ रहा था, पर गांधी की विशेषता यह थी कि उन्होंने अहिंसा को केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे प्रतिकार के साधन के तौर पर विकसित किया। दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई जीतने के बाद वे भारत आए और यहां अहिंसा या सत्याग्रह के प्रयोग का फलक और बड़ा हो गया। चंपारण सत्याग्रह का पहला मैदान था और चंपारण के सत्याग्रह ने पूरे देश को झकझोर दिया। अभी-अभी चंपारण के सौ साल हुए हैं और देश भर में कई आयोजन भी हुए। पीटरमैरिट्जबर्ग की घटना और चंपारण को याद करना रस्मी नहीं होना चाहिए। इन्हें याद करने की सार्थकता तभी है जब देश और दुनिया में यह अहसास बढ़े और बढ़ाया जाए कि साधन शुद्धि के रास्ते से और अहिंसक तरीकों से ही हमें अपने उद्देश्य की प्राप्ति में जुटना चाहिए।

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