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संपादकीय: वोट की खातिर

इससे पहले कर्नाटक के अलग झंडे का मामला उठाया गया। कन्नड़ लोगों की अस्मिता के नाम पर राज्य मंत्रिमंडल ने अलग झंडे को मंजूरी देकर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि झंडा कोड के तहत सिर्फ एक झंडे को मंजूरी दी गई है।

Author March 22, 2018 4:30 AM
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया। (फाइल फोटो)

कर्नाटक सरकार ने राज्य के लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देने का जो दांव चला है, वह स्पष्ट तौर पर विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर किया गया फैसला है। राज्य में विधानसभा चुनाव को अब दो महीने भी नहीं बचे हैं। चुनावों के पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए सरकारें अक्सर ऐसे सियासी खेल खेलती हैं। सोशल इंजीनियरिंग के ऐसे प्रयोग पहले भी होते रहे हैं। कर्नाटक में अलग धार्मिक दर्जे की लिंगायतों की मांग कोई नई नहीं है। पिछले साल बीदर में लिंगायत समुदाय के लोगों ने बड़ा प्रदर्शन किया था, जिसमें महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से भी बड़ी संख्या में लिंगायत समुदाय के लोग पहुंचे थे। तभी सरकार ने इसे लपक लिया और इस मुद्दे पर समिति बना दी, जिसने सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देने की सिफारिश की। गेंद अब केंद्र के पाले में है। सवाल उठता है कि सिर्फ चुनावी लाभ के लिए कर्नाटक सरकार ने यह जो कदम उठाया, वह कितना उचित है?

चुनावी नफा-नुकसान के लिहाज से लिंगायत समुदाय कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए अहमियत रखता है। राज्य की कुल आबादी में इसकी भागीदारी अठारह फीसद के आसपास है। कांग्रेस लिंगायतों को अपना पुराना वोट बैंक मानती है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी लिंगायत समुदाय से आते हैं। समुदाय में उनकी गहरी पैठ है। लिंगायतों को अलग धार्मिक समुदाय मानने के मुद्दे पर राजनीति पुरानी है। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस प्रस्ताव को पहले ही खारिज कर चुके थे। उनका कहना था कि यह फैसला हिंदुओं को बांटने वाला होगा और इससे समुदाय की अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित आरक्षण भी खत्म हो जाएगा। इसलिए अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि सब कुछ जानते-बूझते भी यह दांव क्यों चला गया? बहरहाल, अगर अब केंद्र सरकार इस मसले पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाती तो चुनाव में इसका नुकसान भाजपा को हो सकता है। वहीं लिंगायतों की मांग अपने अंजाम तक पहुंच जाती है तो सफलता का श्रेय कांग्रेस सरकार के खाते में जाएगा। लेकिन जनता, खासतौर से लिंगायत और वीरशैव समुदाय इस मुद्दे पर चल रहे सियासी घमासान और चालों से अनजान नहीं है। वीरशैवों के संत और बलेहोनुर स्थित रंभापुरी पीठ के श्री वीर सोमेश्वर शिवाचार्य स्वामी ने तो इस फैसले को साजिश करार देते हुए कानूनी विकल्प पर विचार करने की धमकी दे डाली है। सुप्रीम कोर्ट ने 1966 में स्वामी नारायण संप्रदाय और 1995 में रामकृष्ण मिशन को हिंदू धर्म से अलग मान्यता देने से इनकार कर दिया था।

इससे पहले कर्नाटक के अलग झंडे का मामला उठाया गया। कन्नड़ लोगों की अस्मिता के नाम पर राज्य मंत्रिमंडल ने अलग झंडे को मंजूरी देकर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि झंडा कोड के तहत सिर्फ एक झंडे को मंजूरी दी गई है। इसलिए एक देश का एक झंडा ही होगा। जम्मू-कश्मीर का मामला अपवाद है, क्योंकि उसके लिए संविधान में अलग व्यवस्था है।

सवाल है कि चुनाव करीब आते ही राज्य सरकार को लिंगायत समुदाय और कन्नड अस्मिता की चिंता क्यों सताने लगी! कर्नाटक या और कोई अन्य राज्य सिर्फ वोट हासिल करने के मकसद से प्रांतीय अस्मिता की दुहाई देता हुआ अलग झंडे की मांग करता है, तो देश की एकता से जुड़े सवाल उठेंगे। चुनाव में जाति-धर्म जैसे मुद्दे सिर्फ लोगों को बांटने और द्वेष पैदा करने का काम करते हैं। बेहतर हो कि विकास, रोजगार और नागरिक सुरक्षा जैसे सवाल भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे बनें।

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