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संपादकीय: कामयाबी की उड़ान

जैव र्इंधन तैयार करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की जरूरत इसलिए है कि प्रदूषण कम करने का यह एक अच्छा विकल्प है। पहली बार उड़ान में जिस जैव र्इंधन का प्रयोग हुआ है, वह हमारे वैज्ञानिकों की नौ साल की कड़ी मेहनत का प्रतिफल है।

Author August 29, 2018 3:07 AM
जैव ईंधन से चलने वाला पहला स्पाइसजेट विमान सोमवार को देहरादून से उड़ान भर कर दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरा।

पहली बार जैव र्इंधन के इस्तेमाल से विमान उड़ाने में भारत ने जो कामयाबी हासिल की है, वह स्वच्छ ऊर्जा के विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है। सोमवार को जैव जेट र्इंधन के प्रयोग से एक यात्री विमान को देहरादून से दिल्ली तक लाया गया। भारत के विमानन इतिहास में यह पहला मौका है जब विमान में जैव र्इंधन का सफल प्रयोग किया गया। इस विमान में पच्चीस फीसद जैव र्इंधन का उपयोग किया गया। इस उड़ान ने साबित कर दिया है कि विमानों को जैव र्इंधन से उड़ाना असंभव नहीं है और यह जैव र्इंधन भविष्य के बड़े ऊर्जा विकल्प के रूप में सामने आ सकता है। इस कामयाबी से भारत अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और न्यूजीलैंड जैसे उन पच्चीस देशों में शुमार हो गया है जो अपने यहां विमानों में जैव र्इंधन का इस्तेमाल कर रहे हैं। जटरोफा नाम की वनस्पति से यह र्इंधन वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) और देहरादून स्थित भारतीय पेट्रोलियम संस्थान ने मिल कर तैयार किया है। सबसे अहम बात यह कि हम पेट्रोल और डीजल जैसे र्इंधन का विकल्प खोजने की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। हालांकि अभी काफी कुछ किया जाना है।

जैव र्इंधन तैयार करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की जरूरत इसलिए है कि प्रदूषण कम करने का यह एक अच्छा विकल्प है। पहली बार उड़ान में जिस जैव र्इंधन का प्रयोग हुआ है, वह हमारे वैज्ञानिकों की नौ साल की कड़ी मेहनत का प्रतिफल है। इस परियोजना पर पंद्रह करोड़ रुपए की लागत आई। यह र्इंधन दूसरे र्इंधनों के मुकाबले कार्बन और अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन भी कम करता है। इसकी खूबी यह है कि इकतालीस हजार फीट की ऊंचाई और शून्य से नीचे 47 डिग्री सेल्शियस तापमान पर यह जमेगा नहीं। इसलिए इसकी सफलता को लेकर बहुत उम्मीदें हैं। सरकार ने जल्द ही वैकल्पिक विमान र्इंधन नीति घोषित करने की बात भी कही है, ताकि विमानन क्षेत्र में स्वच्छ जैविक र्इंधन के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके। आज दुनिया के विकासशील देश वायु प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। ज्यादातर देशों में परिवहन व्यवस्था का ढांचा पेट्रोल और डीजल जैसे पेट्रोलियम र्इंधन पर ही निर्भर है। इसके अलावा और भी कई कामों में बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल होता है। इस समस्या से निजात स्वच्छ ऊर्जा संसाधनों के विकास और इस्तेमाल से ही पाई जा सकती है।

जैव र्इंधन का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भारत की तेल आयात पर निर्भरता घटेगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। अभी देश में आठ लाख करोड़ रुपए के कच्चे तेल का आयात होता है और इसमें से तीस हजार करोड़ रुपए का तेल विमान र्इंधन के लिए होता है। ऐसे में जैव र्इंधन के इस्तेमाल को बढ़ाते हुए पेट्रोल पर निर्भरता कम हो सकती है। कोशिश यह भी हो रही है कि जटरोफा के अलावा अखाद्य तेलों के बीजों से भी र्इंधन बनाया जाए। विमानन क्षेत्र में सुधार के लिए सरकार जो ‘कार्ययोजना-2035’ तैयार कर रही है उसमें सबसे ज्यादा जोर स्वच्छ ऊर्जा पर है। इसलिए वैज्ञानिकों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती जैव र्इंधन के व्यावसायिक उत्पादन की है। जैव र्इंधन पर सरकार ने राष्ट्रीय नीति-2018 को मंजूरी दे दी है। अगर पेट्रोल और डीजल पर निर्भर देश की कुल ऊर्जा जरूरत में से पचास फीसद हिस्सा जैव र्इंधन का उपयोग होने लगे तो यह ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी क्रांति होगी।

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